चुनावी मुद्दा : कभी ‘नेताजी’की झलक पाने को उमड़ते थे लोग

अविक ठाकुर/अमृत विचार। अस्सी के दशक में नेताओं की झलक पाने के लिए हर कोई बेताब रहता था। तब चुनावी जनसभाओं में लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ता था। चाहे सड़क हो या फिर खाली मैदान। सब भरे नजर आते थे। कोई इंदिरा गांधी तो कोई अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने के लिए रात से ही …
अविक ठाकुर/अमृत विचार। अस्सी के दशक में नेताओं की झलक पाने के लिए हर कोई बेताब रहता था। तब चुनावी जनसभाओं में लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ता था। चाहे सड़क हो या फिर खाली मैदान। सब भरे नजर आते थे। कोई इंदिरा गांधी तो कोई अटल बिहारी वाजपेयी को सुनने के लिए रात से ही अपना डेरा डाल दिया
करता था।
अमृत विचार से बातचीत में डॉ. काव्य सौरभ रस्तोगी ने बताया कि 80 के दशक में ना तो सोशल मीडिया हुआ करता था और ना ही न्यूज़ चैनल हुआ करते थे। ऐसे में नेता के आने से पहले ही दीवार लेखन व बैनर लग जाया करते थे। यही वजह थी कि नेताओं की एक झलक पाने के लिए लोगों में काफी उत्साह रहता था। अगर किसी को पता चल जाता कि बड़ा नेता शहर में आने वाला है तो उन लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता था, क्योंकि उस दौर में बड़े नेता से मिल पाना और उसकी एक झलक देख पाना किसी चुनौती से कम नहीं होता था, हालांकि कई बार प्रशंसक नेता को करीब से देखने के लिए चुनावी सभा में 12 घंटे पहले ही अपना डेरा डाल दिया करते थे।
उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी जैसे नेता अपने व्यक्तित्व और अपने आचरणों से जाने जाते थे। जिस कारण लोगों में इनसे मिलने का एक अलग उत्साह रहता था। बताया कि लोग अपने नेताओं को बहुत ही भावुक और ध्यानपूर्वक सुना करते थे।
हेलीकॉप्टर को देखने की होती थी चाहत
1980 के दौर में लोगों के पास साइकिल होना भी बड़ी बात माना जाती थी। अगर किसी के साथ साइकिल या स्कूटर हुआ करता था तो वह काफी अच्छे घराने से माना जाता था, लेकिन उस समय हेलीकॉप्टर को देखना तो किसी म्यूजियम में रखे एंटीक पीस से कम नहीं था। उस दौर में कुछ लोग ही नहीं बल्कि कई स्थानीय नेता थी हेलीकॉप्टर को देखने के लिए जाया करते थे।
नेता के आने पर मेले जैसा दृश्य होता था
तब नेताओं को सुनने के लिए जनसभा स्थल पर मेले जैसा दृश्य हुआ करता था, 12 घंटे पहले से ही लोग जनसभा में जाने की तैयारी शुरू कर देते थे। अपने प्रिय नेता को सुनने आने वाले लोग तब चाट पकौड़ी का भी आनंद लेते थे। नेता जी जहां अपनी पार्टी का प्रचार कर वोट देने की अपील करते थे वहीं चाट-पाकोड़ी वाले की भी अच्छी कमाई हो जाती थी।
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