मां…तुम बहुत याद आती हो : ऋतु गोड़ियाल

मां…तुम बहुत याद आती हो : ऋतु गोड़ियाल

मां…तुम बहुत याद आती हो, सुबह उठते ही भीगे तकिये में, मेरी सूजी हुई लाल आंखों में, मां तुम बहुत याद आती हो। तुम्हारी कही बातें एकाएक सच होने लगी हैं, वो नसीहतें जो बोर हुआ करती थीं, अब मेरे जीवन का हिस्सा हो चली हैं, धीरे बोलो कम बोलो ये सब, काम आने लगा …

मां…तुम बहुत याद आती हो,
सुबह उठते ही भीगे तकिये में,
मेरी सूजी हुई लाल आंखों में,
मां तुम बहुत याद आती हो।
तुम्हारी कही बातें एकाएक सच होने लगी हैं,
वो नसीहतें जो बोर हुआ करती थीं,
अब मेरे जीवन का हिस्सा हो चली हैं,
धीरे बोलो कम बोलो ये सब, काम आने लगा है मां,
उम्र के इस पड़ाव पर,
मेरी आवाज सुनने के लिए कोई नहीं,
कम बोलती हूं, क्योंकि कोई भरोसेदार नहीं,
मां सच तुम बहुत याद आती हो।
काश तुम होती मां,
मैं दिल का हाल सुना पाती,
एक एक घाव दिखा पाती,
आज मन में हजार बातें हैं,
कुछ सुख दुःख जो तुम्हें बताने हैं,
आज भी जब साड़ी ठीक से पहन नहीं पाती,
हंसकर तुम्हें याद करती हूं,
तुम होती तो सिखा देती,
किचन में खाना बनाते हुए,
उस सुगंध में तुम्हें ढूंढ़ती हूं मां,
दिन भर की थकान और कुछ दर्द,
तुम्हारी छाती से लगकर भूलना चाहती हूं मां,
एक अरसा हो गया तुम्हें देखे,
तुम्हारे स्पर्श को महसूस करे,
क्या तुम्हें मैं याद नहीं आती मां,
फिर आ क्यों नहीं आ जाती मां
और ले जाती मुझे भी अपने संग,

ऋतु गोड़ियाल
(लेखिका)

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