सरप्राइज़

कूरियर वाला घर के बाहर की टेबल पर शादी का कार्ड छोड़ गया था। मैं नहाकर निकली तो नाम देखकर मैं दो मिनट के लिए सुन्न रह गई। ‘रवि वेड्स कोमल’! मेरी आंखों के सामने शामली का चेहरा आ गया। अभी कुछ महीनों पहले ही तो मिली थी उससे। पागलों की तरह तारीफ़ कर रही …
कूरियर वाला घर के बाहर की टेबल पर शादी का कार्ड छोड़ गया था। मैं नहाकर निकली तो नाम देखकर मैं दो मिनट के लिए सुन्न रह गई। ‘रवि वेड्स कोमल’! मेरी आंखों के सामने शामली का चेहरा आ गया।
अभी कुछ महीनों पहले ही तो मिली थी उससे। पागलों की तरह तारीफ़ कर रही थी रवि की। कहती थी लड़कों में वो हीरा है।।। और मैं प्लैटिनम।।। उसकी मेरे अलावा किसी और के साथ परफ़ेक्ट सेटिंग नहीं हो सकती। और अगर हो गई तो उसकी चमक खो जाएगी। यह कह कर उसने एक बेपरवाह-सी हंसी हंस दी थी। क्या हो गया उनके छह साल के पुराने प्यार को?
मन की गति भी कितनी तेज़ होती है। मुझे मेरा मन खींचकर कॉलेज के कॉरिडोर्स में ले गया।।। जहां मैं, रवि, शामली और निशा।।। चारों अक्सर होते थे। रवि ने उसका हाथ थाम कर हमारे सामने कहा था,‘देखो।।। ये शामली एक हीरा है और मैं प्लैटिनम। हम दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। कहीं अगर इसकी सेटिंग किसी और के साथ हो गई तो चमकी खो जाएगी।’
फिर ख़ूब हंसे थे हम सब। ऐसी कितनी ही क़समों और वादों के हम साक्षी रहे थे। मेरी तो शादी हो गई, पर शामली और रवि ने अभी तक शादी नहीं की थी। इसकी वजह थी रवि की दो बहनें। रवि चाहता था कि वह उनकी शादी के बाद ही ख़ुद शादी करे।
समय अपनी गति के साथ बदल रहा था और शायद उसके साथ उनके रिश्ते की तक़दीर भी बदल रही थी। मुझे रवि की छोटी बहन की शादी अभी भी याद है। शामली बहू न होकर भी एक बहू के सारे फ़र्ज़ निभा रही थी। हम सब सहेलियां जब मेकअप में व्यस्त थीं तो शामली सभी गेस्ट्स को एंटरटेन कर रही थी। कई लोग उसे प्रश्न भरी नज़रों से भी देख रहे थे।
पर उसे कहां इसकी परवाह थी। वो तो रवि की बावरी थी, कब की उसकी हो चुकी थी। रवि की मां और उसका सारा परिवार शामली को बहुत चाहता था। इसलिए परिवार के विरोध का भी प्रश्न नहीं था। क्या उन कसमों और उन वादों की उम्र इतनी छोटी थी? यह सब सोच कर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने सोचा आशंकाओं से भरे मन को आश्वस्त करने के लिए मेरे पास एक ही रास्ता है कि फ़ोन करने के बजाय मैं शामली से मिलूं। मैंने पुणे जाने का फैसला कर लिया।अजय, यानी मेरे पतिदेव ने पूछा भी,‘पुणे…?क्यों…?’
मैंने सिर्फ़ इतना कहा,‘दोस्ती निभाने।।।’
एक दोस्त ही तो है जो बिना कुछ खंगाले दिलासा दे सकता है। सुबह की बस से मैं पुणे के लिए निकल गई। रास्ते में मुझे उनकी यादों ने वापस घेर लिया। वो तो हमेशा कहते थे,‘प्यार एक भावना है जो समय के साथ इतनी गहरी हो जाती है कि हम ये भी भूल जाते हैं कि हम दो लोग हैं। हर चीज़ में यही लगता है कि हम दोनों ही शामिल हैं।
दोनों का अस्तित्व जब एक-दूसरे में खो जाता है।।। तब उसे हम प्यार कहते हैं।।।’ जब रवि यह सब कुछ कह रहा था तो शामली प्यार से सिर हिला कर उसे अपलक देख रही थी। ये सारे सवाल मेरे मन में कौंध रहे थे और शामली के घर का रास्ता भी बहुत लंबा लग रहा था। क्या बीत रही होगी उस बेचारी पर।
उसने तो पहले ही अपने जन्म के समय अपनी मां को खो दिया था। और शायद इस अपराध के कारण अपने पिता के प्यार से वंचित रही थी। वो तो बस उसकी मौसी थी, जिसने उसे पाला था और अब तो वह भी इस दुनिया में नहीं थी। अकेली, एक छोटा-सा घर लेकर रहती थी। बस एक उम्मीद और आशा के साथ, मन में उमंग लिए रवि के साथ के सपने बुनती रहती थी। कैसे उसने अपने-आप को सम्हाला होगा?
तभी ड्राइवर के हॉर्न से मेरी तंद्रा टूटी और कंडक्टर ने आकर कहा,‘मैडम, आपका स्टॉप आ गया।’
मैंने बड़े ही बोझिल क़दमों और आशंकित मन से शामली के घर का दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा खुला तो शामली ही थी। अचम्भित नज़रों से मेरी ओर देख रही थी। मेरा बैग अपने हाथ में ले कर उसने मुझे घर के अंदर ले लिया। फिर बिना कुछ कहे पूछा,‘कार्ड मिला क्या? ज़रूर मिला होगा। मुझे लगता था तुम ज़रूर आओगी।’
शायद यही होता है दोस्ती में। बिना किसी बंधन के हम चांद और रात की तरह हो जाते हैं। जानते हैं अगर रात होगी तो चांद भी ज़रूर आएगा। एक अजीब-सा विश्वास है रात का चांद और चांद का रात पर।
शामली ने झटपट गरमा-गरम पूरी-सब्ज़ी बनाकर खिलाई। उसके होंठ सूखे हुए थे और आंखें लाल थी। चेहरे पर थी तो एक हारी हुई हंसी। मैंने ज़बरदस्ती उसे कुछ खिलाया। खाते-खाते उसका गला रूंध गया और वो फूट पड़ी,‘यह क्या हो गया अनुषा…?
मैंने तो कभी कुछ ज़्यादा नहीं चाहा था। बस एक छोटा-सा प्यार भरा घर, कुछ अपने और उनके अपनेपन से भरा संसार।।। कैसे मैं इस आंधी में फंसी और ख़ुद अपने हाथों से ही अपना घर उजाड़ लिया। कभी-कभी अपने दिल की आवाज़ हमें अपनों से दूर कर देती है।’
मैंने उसे दिलासा देकर कहा,‘मैं यहां दो दिन साथ हूं।।। आराम से बातें करेंगे। पहले अपनी हालत को संभालो। इस तरह टूट जाओगी तो कैसे संभालोगी सबको जो तुम पर उंगली उठाएंगे।’रात को डिनर में शामली ने मेरे लिए मेरी पसंद की फ़िश करी और राइस बनाई, और साथ में चटनी भी। इतनी बारीक़ी से सबकी पसंद और भावनाओं को पहचानती थी और उसका ध्यान रखती थी। फिर क्यों? यही शब्द घूम रहे थे मेरे मन में। रात में खाने के बाद मैंने सीधा पूछ ही डाला। उसके मन का बादल फूट पड़ा। कहने लगी,‘एक तेज़ बारिश ने मेरा सब कुछ बहा दिया।’
पिछले दो सालों से रवि अपने एक दोस्त सुशांत के साथ एक घर किराए पर लेकर रह रहा था। शामली भी उसके उस घर में अक्सर मिलने जाया करती थी। शामली ने कहा,‘उस दिन रवि का जन्मदिन था और वही हमारे रिश्ते का अंतिम दिन भी था। उस दिन रवि ने जीते जी मुझे और हमारे रिश्ते को तिलांजलि दे दी।’
उस दिन रवि मुझे कहीं डिनर पर ले जाना चाहता था। लेकिन मैंने और सुशांत ने मिलकर उसका सरप्राइज़ बर्थडे प्लान किया था। इसलिए मैंने मना कर दिया। उधर सुशांत ने भी मना कर दिया। रवि उदास होकर हमेशा की तरह मूवी चला गया। जब भी वह परेशान होता था तो मूवी चला जाता था। हम दोनों ने सोचा इस बीच हम सरप्राइज़ पार्टी की तैयारी कर लेंगे।
सुशांत से बात कर मैं रवि की पसंद की बिरयानी, गाजर का हलवा और केक लेकर आ रही थी। रास्ते में ही बहुत तेज़ बारिश होने लगी। टैक्सी से उतरकर उसके घर तक पहुंचते-पहुंचते मैं पूरी तरह भीग चुकी की थी। घर के अंदर आते ही सुशांत ने कहा,‘मैं कॉफ़ी बनाता हूं तुम चेंज कर लो।’
मैं बाथरूम में कपड़े बदल रही थी तभी मुझे वहां एक छिपकली दिखी।
तुम तो जानती ही हो मुझे छिपकली से फ़ोबिया है। छिपकली दिखते ही मैं आधे-अधूरे कपड़े पहनकर बाथरूम से भागी और डर के मारे सामने खड़े सुशांत से लिपट गई। ठीक उसी समय रवि दूसरी चाबी से दरवाज़ा खोलकर घर के अंदर आ गया। उसने आधे-अधूरे कपड़े पहने मुझे शशांक की बांहों में दिखा। कहने लगा,‘पहले बता देती तो मैं दरवाज़ा नॉक कर अंदर आता। इन कपड़ों में फ़िल्म चलोगी मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।’
यह कहकर वह तेज़ क़दमों के साथ उस तेज़ बारिश में सभी कसमों-वादों को बहाता हुआ चला गया। पलभर के लिए भी नहीं मुड़ा। मैं उसे आवाज़ लगाती रही पर उसने तो जैसे मुझे श्राप दे कर अहिल्या की तरह पत्थर बना दिया था। जैसे कह गया हो,‘तुम आजीवन इसी तरह प्यार की प्रतीक्षा करती रहोगी।’
लगता है सच में शामली अहिल्या बन गई थी।
तभी तो उसने पिछले छह महीनों में किसी से बात तक नहीं की। उसे यह भी पता चल गया था कि रवि ने सुशांत से भी दोस्ती तोड़ ली थी। शायद कसमें और वादे अक्सर झूठे ही होते हैं और समय के एक अंतराल तक ही टिकते हैं। मैंने ज़ोर से शामली को गले लगा लिया और कहा,‘चलो जो हुआ अच्छा ही हुआ। विश्वास की इतनी कच्ची डोर के साथ अगर तुम कुछ दूर चल भी लेती तो तुम्हें आज नहीं तो कल गिरना ही था।
आज तुम्हारे क़दम फिर चल सकते हैं, तुम्हारी आंखें फिर से सपने सजा सकती हैं। और तुम्हें शायद सच्चा प्लैटिनम भी मिल जाए जो तुम जैसे हीरे को सही तरह से सुरक्षित रख सके और उसकी चमक को कभी धूमिल न होने दे।’
शामली की आंखें छलक गईं। दिल की यही मजबूरी है, वह दिमाग़ से परे सोचता है। उसने कहा,‘ख़ैर छोड़ो भी मैं तुम्हारे नज़रिए से भी देखने की कोशिश करूंगी।’ फिर उसने हंसते हुए कहा,‘क्या पता कोई दूसरा रवि ढूंढ़ लूं।’
उसके बाद मैं चार-पांच दिन तक शामली के घर पर ही रुकी रही और उसके टूटे हुए दिल पर मरहम-पट्टी लगाती रही। घाव ठीक हुए या नहीं ये तो नहीं पता, पर मुझे विश्वास है कि उसका दर्द ज़रूर कुछ कम हुआ होगा।
मुम्बई वापस लौटते समय मेरी आंखों के सामने शामली की वही उदास पत्थर-सी आंखें घूम रही थीं। उसकी हारी हुई हंसी एक बार फिर से रामायण की अहिल्या की याद दिला रही थी, जिसे बिना कोई अपराध किए कई वर्षों तक पत्थर का बन कर रहना पड़ा। उस मुलाक़ात के बाद मैं भी कुछ अपने परिवार में व्यस्त हो गई। तीन साल गुज़र गए। इस बीच शामली से दो-तीन बार फ़ोन पर बात हुई, पर उसकी दशा में कोई भी परिवर्तन नहीं दिखा।
आज हमारा कॉलेज रीयूनियन था। मैं जानती थी कि रवि इस रीयूनियन में ज़रूर आएगा, पर शामली के आने आशा नहीं थी। अचानक वहां मैंने शामली को देखा। वह ख़ूब हंस-हंस कर रवि से बातें कर रही थी। शामली चेहरे पर बिना कोई शिकायत लिए रवि से ऐसे मिल रही थी जैसे या तो पहले कभी उनका कोई रिश्ता ही न था, या फिर इस बीच सब कुछ वापस जुड़ गया था।
शायद मैंने ही उसे ग़लती से अहिल्या समझ लिया था, जो अपनी मुक्ति के लिए युग-युग तक अपने राम की प्रतीक्षा करती रहेगी। उसका वह रूप देख कर मुझे लगा कि वह तो आज की अहिल्या थी जो पत्थर की मूर्ति नहीं बनी रह सकती। आज की लड़की जो ठिठक तो सकती है पर रुक नहीं सकती। जो अपने जीवन में स्वयं प्राण डाल सकती है।
फिर हम बहुत गर्मजोशी से मिले। उसने तपाक से रवि के सामने ही मुझे मिलाया अपने आशु से। कहा,‘इससे मिलो।।।! तुम कहती थी ना कि मुझे अपना प्लैटिनम ज़रूर मिलेगा। यही है मेरा प्लैटिनम।।। जो अपनी आत्मा की आवाज़ पर भरोसा करता है, न कि अपनी आंखों पर…’