बरेली: उम्र बीत गई... खत्म नहीं हुए चकबंदी के चक्कर
किसानों की मुसीबत: चकबंदी में फंसने के बाद कोई आठ तो कोई दस साल से लगा रहा है दौड़

अनुपम सिंह/ बरेली, अमृत विचार। एक बार जमीन चकबंदी में फंस गई तो समझो किसान के लिए जिंदगी भर की दिक्कतों का इंतजाम हो गया। जिले में सैकड़ों ऐसे किसान हैं जो चकबंदी के बाद कहीं के न रहे। तमाम साल तहसील के चक्कर काटे और अब चकबंदी न्यायालयों के चक्कर काट रहे हैं लेकिन फिर भी तारीख के अलावा कुछ नहीं मिल पा रहा है। सालों से अलग-अलग कोर्ट में 302 केस लंबित हैं। करीब दो सौ आपत्तियाें का निस्तारण लटका पड़ा है और 102 केस अपील में लगे हुए हैं।
जिले के तमाम गांवों में चकबंदी के बाद किसानों के सामने परेशानियों का पहाड़ खड़ा हो गया है। कहीं किसी का रकबा कम हो गया है तो किसी को उपजाऊ जमीन लेकर बंजर जमीन दे दी गई है। इसके अलावा कई किसानों को जो जमीन दी गई है, उस पर दूसरे कास्तकारों के कब्जे हैं। चकबंदी विभाग ने कागजी खानापूरी कर पल्ला झाड़ लिया और अब किसान मारे-मारे घूम रहे हैं। तहसीलों में समस्याओं का निस्तारण न होने के बाद चकबंदी न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया लेकिन यहां भी न्याय के बजाय सिर्फ तारीख मिल रही है।
खत्म ही नहीं होता आपत्तियों और अपीलों का सिलसिला
चकबंदी के चक्कर में फंसे किसानों की शिकायत है कि चकबंदी न्यायालय में उनके केस हल कराने में किसी की दिलचस्पी नहीं दिखती। उन्हें हर बार नई तारीख दे दी जाती है। वे हर तारीख पर उम्मीद लेकर चकबंदी न्यायालयों में पहुंचते हैं और फिर तारीख लेकर लौट आते हैं। आपत्तियों और अपीलों का सिलसिला खत्म ही नहीं होता और केस लंबा खिंचता रहता है।
दाढ़ी सफेद हो गई, केस खत्म नहीं हुआ
फरीदपुर तहसील के गांव तीरथपुर धीरी के गंगा सिंह बताते हैं कि चकबंदी के बाद उनका रकबा कम हो गया था। आपत्ति लगाकर कई साल तहसील के चक्कर काटे। फिर चकबंदी न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। दस साल से दौड़भाग कर रहे हैं लेकिन समस्या हल नहीं हो पाई। बोले- जब केस शुरू हुआ था तो उनकी दाढ़ी और सिर के बाल नहीं पके थे। 50 की उम्र में शरीर भी मजबूत था लेकिन अब 60 के हो गए हैं। छह वकील बदल लिए लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। तारीख पर आए थे, अब फिर तारीख लेकर जा रहे हैं।
बता नहीं सकता, सात साल में कितने चक्कर काटे
मुड़िया अहमदपुर गांव के शरीफ चकबंदी न्यायालय में पेशी पर पहुंचे थे जहां उन्हें फिर एक जुलाई की नई तारीख दे दी गई तो कोर्ट के बाहर परेशान दिखे। बोले, सात साल हो गए केस लड़ते हुए, दूसरे लोग कब्जा जता रहे है। पैमाइश के लिए दौड़ रहा हूं। चकबंदी में समस्या हो गई थी। कभी 15 दिन, कभी 10 दिन तो कभी आठ दिन बढ़ाकर नई तारीख दे दी जाती है। सात सालों में कितनी तारीखें मिली, कितना पैसा खर्च हुआ और यहां कितनी बार आया हूं, कोई गिनती ही नहीं है।
हर तारीख पर 80 किमी की दौड़ और 70 रुपये का खर्च
आंवला तहसील के बेहटा लालच के जगजीवन की भी तारीख पर आए थे और सुनवाई टल जाने की वजह से मायूस थे। बोले, नई तारीख पर बुलाया है। उनकी डेढ़ बीघा उपजाऊ जमीन थी, जिसे चकबंदी में बदलकर बंजर जमीन दे दी गई। लेखपाल और कानूनगो से कहते-कहते परेशान हो गए तो चकबंदी न्यायालय में केस किया। अब डेढ़ साल से दौड़ रहे हैं। घर 40 किमी दूर है, एक बार तारीख करने पर 70 रुपये तो किराया ही लग जाता है।
लंबित मामलों के निस्तारण में तेजी लाई जाएगी। सीओ और एसीओ को सुनवाई तेज कर केसों के निस्तारण के लिए कहा गया है। ज्यादा मामले लंबित नहीं हैं, जो हैं वह पुराने हैं। कानूनी पेच फंसने से निस्तारण में देरी हो जाती है - पवन कुमार सिंह, बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी।
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