अकबर इलाहाबादी: शायरी जो भुला न पाएंगे
By Jagat Mishra
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खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हों तो अखबार निकालो.
जब अपनी फितरत को बयान करने की बारी आती है तो इठला कर कहा जाता है:
दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं
बाज़ार से गुजरा हूं खरीदार नहीं हूं.
अपनी बेगुनाही को अक्सर इस तरह भी तो व्यक्त किया जाता है:
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती.
या जब गुलाम अली गाते हैं तो यकबयक हम भी गुनगुना देते हैं:
हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है.