अकबर इलाहाबादी: शायरी जो भुला न पाएंगे  

अकबर इलाहाबादी: शायरी जो भुला न पाएंगे  

खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो

जब तोप मुक़ाबिल हों तो अखबार निकालो.


जब अपनी फितरत को बयान करने की बारी आती है तो इठला कर कहा जाता है:


दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं

बाज़ार से गुजरा हूं खरीदार नहीं हूं.


अपनी बेगुनाही को अक्‍सर इस तरह भी तो व्‍यक्‍त किया जाता है:


हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

वो कत्‍ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती.


या जब गुलाम अली गाते हैं तो यकबयक हम भी गुनगुना देते हैं:


हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है

डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है.