रामनगरी अयोध्या है श्री वैष्णव उपासना का केन्द्र

रामनगरी अयोध्या है श्री वैष्णव उपासना का केन्द्र

अयोध्या। रामनगरी अयोध्या विशेष रूप से रामानंद सम्प्रदाय की भूमि है। रामानुज और बल्लभादि के भी मठ-मन्दिर यहां हैं। अयोध्या अनादि तीर्थ है। सप्तमोक्षदायिनी पुरियों में पहला है। इसलिए इसे आद्या भी कहते हैं। यह बौद्धों की भी साधना भूमि के रूप में विश्व विख्यात रही है। अनादिकाल से अयोध्या में जैनियों की परम्पराएं भी …

अयोध्या। रामनगरी अयोध्या विशेष रूप से रामानंद सम्प्रदाय की भूमि है। रामानुज और बल्लभादि के भी मठ-मन्दिर यहां हैं। अयोध्या अनादि तीर्थ है। सप्तमोक्षदायिनी पुरियों में पहला है। इसलिए इसे आद्या भी कहते हैं। यह बौद्धों की भी साधना भूमि के रूप में विश्व विख्यात रही है।

अनादिकाल से अयोध्या में जैनियों की परम्पराएं भी प्रवाहित होती आ रही हैं। आर्षग्रन्थों और बौद्ध-जैनग्रंथों में इसे अनेक नामों से सम्बोधित किया गया है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की यह अवतरण भूमि है। रामचरित मानस और उसकी पहली टीका का शुरूआत भी रामचरणदास उपाख्य करुणासिन्धु दास महाराज के द्वारा ही से हुआ था। वृहद्काय उत्कृष्ट मानस-पीयूष श्री अंजनीशरण जी के द्वारा यहीं लिखा गया हैं।

यहां इक्ष्वाकुवंश-सूर्यवंश के अनेक पुण्य-प्रतापी धर्म -धुरन्धर राजा हुए हैं। यह मानवता, चरित्र -करुणा, सत्य -अहिंसा की पावन भूमि है। यह शाश्वत धर्म -तीर्थ -क्षेत्र है।

महात्मा बुद्ध ने अपने जीवन के छः साल अयोध्या में बिताए थे। अयोध्या का दन्तधावनकुण्ड और मणिपर्वत उनकी महिमा से मण्डित है।
हजरत पैगम्बर शीश की दरगाह, फरिश्तों के उतरने की पाकजमीं, बड़ी बुआ की मजार, इल्मशाह की मजार, हजरत नूह की कब्र, नौगजी मजार भी यहां है।  6 से 9 गज तक की कब्रें मिलती हैं यहां। खुर्द मक्का और रामभक्त कलन्दरशाह की मस्तफकीरी की अयोध्या ग्वाह रही है। अयोध्या में मठ-मन्दिरों, देवालयों-जिनालयों की बहुलता है।

तंत्रग्रंथ रुद्रयामल में अयोध्या पुरी को तीर्थों का मस्तक-पुण्यतमा कहा गया है। उपपातक या ब्रह्महत्यादि महापातक अयोध्या से दूर रहते हैं। दुर्गुणों से इसे कभी भी नहीं जीता जा सकता। तीर्थ-कुण्ड, हरि-सर, पर्वत-वन, मन्दिर-घाट और अन्तर्गृही तीर्थस्थान अयोध्या की आध्यात्मिक थाती हैं ।

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