कैसे हुई हिन्दू संवत की शुरुआत, भारत में कैसे बढ़ी इसकी लोकप्रियता, जानिए
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अमृत विचार। हिन्दू नववर्ष या विक्रम संवत से हम सभी वाकिफ है। यह संवत भारत, नेपाल और हिन्दू बहुल क्षेत्रो में उपयोग किया जाता है। पर क्या आपको मालूम है कि इसे बनाने का काम किसने किया था। अगर नहीं तो आज हम आपको इसके बारे में पूरी कहानी विस्तार में बताएंगे।
विक्रम संवत का कैलेंडर बनाने उसे और बेहतर करने का कार्य योगी भृतहरि नामक व्यत्कि ने किया था। वह एक भारतीय दार्शनिक संत और योगी था जिसे संस्कृत साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान मिला था। भृतहरि योगी बनने से पूर्व उज्जैन के राजा थे। उन्हें विलासिता और भोग में रूचि थी। ऐसा कहा जाता है कि उनकी पत्नी के द्वारा छोड़े जाने के कारण राजपाट का त्याग और संत का जीवन अपनाकर वह जंगलो में वास करने लगें। इस विश्वासघात ने उन्हें आत्म मंथन करने को प्रेरित किया।
ध्यान साधना और योग के लिए प्रसिद्ध योगी भृतहरि राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। उन्होंने नीति शास्त्र, योग और ध्यान के कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। मान्यता है कि विक्रम संवत की गणना और वैज्ञानिक आधार को स्पष्ट करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
अपने भाई विक्रमादित्य को राजा बनाकर भृतहरि ने संन्यास ले लिया। योग और साधना में लीन भृतहरि महान योगी और दार्शनिक बन गए। उनके द्वारा रचित वैराग्य शतक' उनके वैराग्य जीवन का आइना है जिसमें वह अपने जीवन परिवर्तन को स्पष्ट रूप को दर्शाते है। भृतहरि संस्कृत साहित्य के तीन शतकों के लिए प्रसिद्ध हुए। ये मुख्यता नीतिशतक, वैराग्यशतक और शृंगारशतक के लिए जाना जाता है।
कैसे हुई थी संवत की शुरुआत
कैलेंडर (संवत) बनाने की कहानी भृतहरि के भाई विक्रमादित्य से जुडी है। मान्यता है कि राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में एक नए संवत की शुरुआत हुई थी जिसे विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है। लोकथाओं के अनुसार जब राजा भृतहरि राजपाट त्याग कर वैराग्य को अपनाया, तो अपने भाई के सम्मान में विक्रमादित्य ने इस संवत की शुरुआत की। कुछ कथाओ में यह भी कहा जाता है कि विक्रमादित्य ने भृतहरि से इस संवत को आरम्भ करने की प्रेरणा मिली ली थी।
बता दें कि इस विक्रम संवत यानी हिन्दू पंचाग को भृतहरि ने तैयार किया था। इसके लिए उन्होंने कई अध्यन किये थे।
खगोलीय अध्ययन
भृतहरि ने पृथ्वी और चन्द्रमा कि गति को ध्यान में रखते हुए ही पंचाग को तैयार किया। उन्होंने खगोलीय घटना और ब्रम्हांडीय चक्रो का काफी गहन अध्यन किया।
ग्रहों और नक्षत्रो का अध्ययन
भृतहरि ने ग्रहों की स्तिथि और उनके प्रभावों का अध्ययन कर इसका उपयोग किया। इससे महीने और वर्ष की गणना की।
मौसम परिवर्तन का अध्ययन
भृतहरि ने ऋतुओ में होने वाले परिवर्तन का विश्लेषण किया। उन्होंने महीनो और तिथियों को व्यवस्थित किया। जिससे सामाजिक जीवन ही नहीं बल्कि खेती भी प्रभावित होती है।
चंद्र-सौर समायोजन का अध्ययन
उन्होंने ने चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच में समायोजन तकनीक विकसित की थी। जिससे विक्रम संवत सटीक बना।
विक्रम संवत भारत के कई हिस्सों में धीरे धीरे लोकप्रिय होने लगा। यह पंचांग हिन्दू धर्म के प्रमुख पर्वो अनुष्ठानो और त्योहारों की गणना के लिए महत्वपूर्ण प्रणाली बन गया।