रामपुर: गुलजार होगा पायल की छन-छन वाला मकबरा, भूल भूलैया का भी होगा कायाकल्प

किदवंती है कि तूती वाले मकबरे में रात को सुनाई देती है छन-छन की आवाज, बेनजीर बाग के सामने स्थित है कदम शरीफ में रखा नबी-ए-करीम का कदम

रामपुर: गुलजार होगा पायल की छन-छन वाला मकबरा, भूल भूलैया का भी होगा कायाकल्प

(सुहेल जैदी) रामपुर,अमृत विचार। रामपुर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कदम शरीफ, तूती वाला मकबरा और भूल भुलैया का भी कायाकल्प हो। किदवंती है कि तूती वाले मकबरे में रात को छन-छन की आवाज सुनाई देती है। बेनजीर बाग के सामने स्थित इमारत में नबी-ए-करीम का कदम शरीफ रखा है जिसकी जियारत को दूर-दराज से लोग आते हैं। जबकि, भूल भुलैया में एक जैसे दरवाजे होने पर लोग उनमें गोल-गोल घूमते रहते हैं। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय पर्यटक स्थल के रूप में इन जगहों को भी विकसित कर सकता है।

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रामपुर रेलवे स्टेशन से करीब 8 किमी. की दूरी पर राजकीय रजा स्नातकोत्तर महाविद्यालय से करीब 500 कदम के फासले पर रामपुर रियासत के फाउंडर नवाब फैजुल्लाह खां के मजार से चंद कदमों की दूरी पर घनी झाड़ियों से घिरा तूती वाला मकबरा है। तूती को लेकर रामपुर और आसपास बहुत सी किदवंतियां हैं कि नवाब ने तूती को जिंदा जमीन में गढ़वा दिया था। लेकिन, इतिहासकार बताते हैं कि उनका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। इतिहासकारों का कहना है कि तूती बहुत खूबसूरत नृत्यांगना थी और उसकी आवाज में जादू था। 

तूती के तमाम किस्सों को नवाब हामिद अली खां से जोड़ा जाता है कि उन्होंने तूती को जिंदा जमीन में गड़वा दिया था। । इसके बाद नवाब यूसुफ अली खां ने नवाबों के कब्रिस्तान में ससम्मान तूती को दफ्न कराया और बेहतरीन मकबरे का निर्माण कराया। कहा कि कुछ लोग इतिहास को तोड़ मरोड़कर पेश करते हैं जोकि, आने वाली पीढ़ियों को भ्रमित कर देता है। फिलवक्त तूती वाला मकबरा जर्जर हालत में है चारों ओर झाड़ियां हैं झाड़ियों के बीच से होते हुए तूती के मकबरे तक पहुंचना बहुत खौफनाक लगता है। तूती की कब्र के बीचों-बीच एक अंजीर का पेड़ उग आया है और उसपर ढेरों अंजीर लगे हैं। लगता है आज भी नक्कारखाने में तूती की आवाज को सुनने वाला कोई नहीं है।

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रजा लाइब्रेरी में है पांडुलिपि तूती जान
रजा लाइब्रेरी में एक पांडुलिपि बहुत कम पन्नों की तूती जान नाम से पांडुलिपि है जिसमें तूती का जिक्र है। तूती ठुमरी और दादरे की माहिर उस्ताद थीं, तूती की आवाज का जादू सिर चढ़कर बोलता था। इतिहासकार नफीस सिद्दीकी बताते हैं कि उनकी नाजो अदा और खूबसूरती के चर्चे भी पांडुलिपि में किए गए हैं।

तूती के मकबरे पर मुरादें पाने के लिए पहुंचते हैं किन्नर
तूती वाले मकबरे पर मुरादें पाने के लिए किन्नर पहुंचते हैं और अपनी आवाज में उन्हीं जैसा जादू नृत्य कला में दक्ष होने के लिए दुआएं मांगते हैं। तूती वाले मकबरे पर मौजूद शाकिर अली ने बताया कि तूती वाले मकबरे की अनदेखी हो रही है लोग बिना जानकारी के लिए तूती की बाबत गलत बोलते हैं। तूती की कब्र भी फना हो गई है मकबरा भी जर्जर हालत में है। बताते हैं कि बुजुर्गो से सुनते थे कि पहले रात को तूती वाले मकबरे से घुंघरुओं के छन-छन की आवाज आती थी कभी-कभी नाचने-गाने की आवाजें आया करती थीं लेकिन, फिलहाल कोई आवाज नहीं आती है।  

तूती वर्ष 1857 में रामपुर रियासत में लखनऊ से आईं थीं। उस समय नवाब हामिद अली खां पैदा भी नहीं हुए थे वह दौर नवाब यूसुफ अली खां का दौर था और वह तूती की गायकी को पसंद करते थे। यह बात महल की बेगमात को पसंद नहीं थी और उन्होंने षड्यंत्र रचकर तूती को जहर दे दिया था।-नफीस सिद्दीकी, प्रसिद्ध इतिहासकार  

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