राजघाट ही नहीं यूपी के रामपुर में भी दफ्न हैं बापू की अस्थियां

राजघाट ही नहीं यूपी के रामपुर में भी दफ्न हैं बापू की अस्थियां

रामपुर, अमृत विचार। दिल्ली के राजघाट की तर्ज पर रामपुर में भी गांधी समाधि है। 11 फरवरी 1948 को नवाब रजा अली खां विशेष ट्रेन से बापू की अस्थियां रामपुर लाए थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियों का कुछ हिस्सा कोसी नदी में विसर्जित कर दिया गया। शेष अस्थियों को अष्ट धातु के कलश में रखकर नवाब गेट के निकट दफ्न कर दिया गया था। नवाब गेट के निकट चौराहे के बीच गांधी समाधि स्थित है। जहां दो अक्टूबर, 15 अगस्त और 26 जनवरी को ध्वजारोहण होता है।

शांति और अहिंसा के प्रतीक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का रामपुर से अटूट नाता रहा। मौलाना मोहम्मद अली जौहर के पास महात्मा गांधी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आते रहे। इसी दौरान महात्मा गांधी और मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने नवाब हामिद अली खां से मुलाकात की। नवाब के दरबार में नंगे सिर नहीं जाया जाता था। इसलिए बी अम्मा, मौलाना मोहम्मद अली जौहर की मां ने खादी की टोपी अपने हाथों से सिलकर महात्मा गांधी को पहनने के लिए दी। तभी से वह टोपी गांधी कैप के नाम से प्रसिद्ध है। रामपुर आने पर हर खास व्यक्ति पहले गांधी समाधि पर पहुंचकर पुष्प अर्पित कर नमन करता है।

गांधी समाधि का सौंदर्यीकरण होने पर बदला स्वरूप
गांधी समाधि का सपा सरकार में आजम खां ने सौंदर्यीकरण कराया लेकिन, इसके बाद से गांधी समाधि का स्वरूप बदल गया है। पहले खुले में संगमरमर के शंख लगी गांधी समाधि बरबस ही लोगों को आकर्षित करती थी। लेकिन सौंदर्यीकरण के बाद गांधी समाधि की सादगी खत्म हो गई है। महात्मा गांधी को नाथूराम गोडसे द्वारा गोली मारने के बाद रामपुर रियासत में तीन दिन का शोक रखा गया था और रामपुर रियासत के झंडे को झुका दिया गया था। 

महात्मा गांधी की अस्थियां रामपुर आने के बाद उन्हें फिजिकल कालेज स्टेडियम पर रखा गया था। इसके बाद महात्मा गांधी की अस्थियां सजी हुई नाव में रखकर कोसी में विसर्जित की गई थीं और बाकी अस्थियों को चांदी के कैप्सूल में रखकर अष्ट धातु के कलश में दफ्न कर दिया गया था।

महात्मा गांधी की अस्थियों लेने के लिए नवाब रजा अली खां और उनके मुख्यमंत्री व दरबारी पंडित अपनी ट्रेन से सवार हुए थे। दिल्ली में काफी बहस के बाद बापू की अस्थियों को रामपुर लाया गया था। 

रेलवे स्टेशन से सजे हुए हाथी पर बापू के अस्थियों के कलश को रखकर फिजिकल कालेज स्टेडियम पर लाया गया और लोगों ने पुष्प अर्पित कर नमन किया। बापू की अस्थियों को कोसी में विसर्जित कर दिया गया। जबकि कुछ अस्थियां चांदी के कैप्सूल में रखकर दफना दी गईं। नवाब ने खुद अपने हाथ से यह काम किया और फिर यहीं पर गांधी समाधि बना दी गई। - नफीस सिद्दीकी, इतिहासकार।

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