महामहिम का रोचक किस्सा: ‘द्रौपदी’ नहीं था देश की नई राष्ट्रपति का नाम, क्यों हो गए ना हैरान !
नई दिल्ली। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को देश की 15वीं राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ग्रहण की। देश के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमणा ने संसद के केंद्रीय कक्ष में उन्हें राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई। देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति और दूसरी महिला राष्ट्रपति बनीं द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के …
नई दिल्ली। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को देश की 15वीं राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ग्रहण की। देश के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमणा ने संसद के केंद्रीय कक्ष में उन्हें राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई। देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति और दूसरी महिला राष्ट्रपति बनीं द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को हराया था।
राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को अपने भाषण में कहा, मैंने अपने जीवन की यात्रा ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव से शुरू की थी। उन्होंने कहा, मैं जिस पृष्ठभूमि से आती हूं वहां मेरे लिए प्रारंभिक शिक्षा पाना भी सपने जैसा था…मैं कॉलेज जाने वाली गांव की पहली व्यक्ति थी।
राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को अपने भाषण में कहा, मैं चाहती हूं कि हमारी सभी बहनें व बेटियां अधिक से अधिक सशक्त हों तथा वे देश के हर क्षेत्र में अपना योगदान बढ़ाती रहें। गौरतलब है कि मुर्मू देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति व प्रतिभा पाटिल के बाद दूसरी महिला राष्ट्रपति बनी हैं।
भारत की नई राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कुछ समय पहले एक ओडिया पत्रिका को दिए इंटरव्यू में बताया था कि शुरुआत में उनका नाम ‘द्रौपदी’ नहीं था। उन्होंने बताया कि उनका संथाली नाम ‘पुती’ था जिसे स्कूल में बदलकर ‘द्रौपदी’ कर दिया गया था। उन्होंने कहा, शिक्षक को…मेरा पुराना नाम पसंद नहीं था…इसलिए बेहतरी के लिए उन्होंने इसे बदल दिया।
भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी का नाम महाकाव्य ‘महाभारत’ के एक चरित्र के नाम पर उनके स्कूल के टीचर ने रखा था। एक ओडियो वीडियो पत्रिका को कुछ समय पहले दिए इंटरव्यू में मुर्मू ने बताया था कि उनका संथाली नाम ‘पुती’ था, जिसे स्कूल में शिक्षक ने बदलकर द्रौपदी कर दिया था। मुर्मू ने पत्रिका से कहा था कि द्रौपदी मेरा असली नाम नहीं था। मेरा यह नाम अन्य जिले के एक शिक्षक ने रखा था, जो मेरे पैतृक जिले मयूरभंज के नहीं थे।
मुर्मू ने बताया था कि आदिवासी बहुल मयूरभंज जिले के शिक्षक 1960 के दशक में बालासोर या कटक दौरे पर जाया करते थे। यह पूछे जाने पर कि उनका नाम द्रौपदी क्यों है, उन्होंने कहा था, शिक्षक को मेरा पुराना नाम पसंद नहीं था और इसलिए बेहतरी के लिए उन्होंने इसे बदल दिया। मेरा नाम ‘दुरपदी’ से लेकर ‘दोर्पदी’ तक कई बार बदला गया।
मुर्मू ने बताया कि संथाली संस्कृति में नाम पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहते हैं। उन्होंने कहा कि अगर एक लड़की का जन्म होता है, तो उसे उसकी दादी का नाम दिया जाता है और लड़का जन्म लेता है तो उसका नाम दादा के नाम पर रखा जाता है। द्रौपदी का स्कूल और कॉलेज में उपनाम टुडू था। उन्होंने एक बैंक अधिकारी श्याम चरण टुडू से शादी करने के बाद मुर्मू उपनाम अपना लिया था।
द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को संसद के केंद्रीय कक्ष में देश के 15वें राष्ट्रपति के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। भारत के प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमन्ना उन्हें राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर निर्वाचित होने से बहुत पहले मुर्मू ने राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण पर अपने विचार स्पष्ट किए थे।
मुर्मू ने पत्रिका से कहा था कि पुरुष वर्चस्व वाली राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए। राजनीतिक दल इस स्थिति को बदल सकते हैं क्योंकि वहीं हैं जो उम्मीदवार चुनते हैं और चुनाव लड़ने के लिए टिकट बांटते हैं। मुर्मू ने 18 फरवरी 2020 को ‘ब्रह्माकुमारी गॉडलीवुड स्टूडियो’ को दिए एक अन्य साक्षात्कार में अपने 25 वर्षीय बड़े बेटे लक्ष्मण की मृत्यु के बाद के अनुभव को साझा किया था।
मुर्मू ने कहा, अपने बेटे के निधन के बाद, मैं पूरी तरह टूट गई थी। मैं दो महीने तक तनाव में थी। मैंने लोगों से मिलना बंद कर दिया था और घर पर ही रहती थी। बाद में मैं ईश्वरीय प्रजापति ब्रह्माकुमारी का हिस्सा बनी और योगाभ्यास किया व ध्यान लगाया। गौरतलब है कि भारत की 15वें राष्ट्रपति मुर्मू के छोटे बेटे सिपुन की भी 2013 में सड़क हादसे में जान चली गई थी और बाद में उनके भाई व मां का भी निधन हो गया था।
मुर्मू ने कहा कि मेरी जिंदगी में सुनामी आ गई थी। छह महीने के भीतर मेरे परिवार के तीन सदस्यों का निधन हो गया था। मुर्मू के पति श्याम चरण का निधन 2014 में हो गया था। उन्होंने कहा कि एक समय था, जब मुझे लगा था कि कभी भी मेरी जान जा सकती है। मुर्मू ने कहा कि जीवन में दुख और सुख का अपना-अपना स्थान है।
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