रामपुर: रजा लाइब्रेरी के 250 वर्ष पूरे; आयोजित कार्यक्रम में एमजे अकबर बोले- गांधी जी के विचारों की वजह से हमारा प्रजातंत्र सबसे मजबूत
रामपुर, अमृत विचार। रजा लाइब्रेरी में बुधवार की शाम मुख्य अतिथि एमजे अकबर प्रख्यात विचारक एवं पत्रकार पूर्व विदेश राज्यमंत्री ने कहा कि गांधी जी ने हमें खौफ और भय से आजाद कराया। जब पूर्ण स्वराज हुआ उस जमाने में गांधी जी ने यह ध्यान दिया कि मुल्क तो हमारे मन में आजाद हो ही चुका है, पूर्ण स्वराज तो आ ही गया है,लेकिन मुल्क को हम बनाए कैसे। गांधी जी के अनुसार आजादी का मतलब था आवाज की आजादी, महजब की आजादी। गांधी जी के विचारों के कारण ही आज का हमारा प्रजातंत्र दुनिया में सबसे मजबूत है।
रजा पुस्तकालय एवं संग्रहालय में 7 अक्टूबर को 250 वर्ष पूर्ण हाने के उपलक्ष्य में कार्यक्रमों का प्रारम्भ हो गया। कार्यक्रमों के श्रृंखला के अनुसार गांधी जयन्ती के उपलक्ष्य में वसुधैव समन्वयक महात्मा गांधी विषय पर विचार गोष्ठी एवं भजन संध्या हुई। कार्यक्रम से पूर्व उपस्थित सभी अतिथियों ने अपराह्न 2:30 बजे गांधी समाधि पर पुष्प अर्पित किये।
उसके बाद रजा लाइब्रेरी में वसुधैव समन्वयक गांधी विषय पर विचार गोष्ठी प्रारम्भ हुई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एमजे अकबर, विशेष अतिथि इतिहासकार संयुक्त निदेशक प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय नई दिल्ली डॉ. रविकांत मिश्र , डॉ. विकास पाठक, ज्योतिष जोशी प्रख्यात विचारक साहित्यकार लेखक आलोचक व कलाविद् द्वारा बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया।
विशिष्ट अतिथि डॉ. ज्योतिष जोशी ने अपना बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि गांधी जी अनुसार सत्य ही ईश्वर है, सत्य ही प्रेम है, सत्य ही परमआत्मा है, सत्य ही वह अनुष्ठान है, जिसके लिए हम जीने का संकल्प करते हैं। विशिष्ट अतिथि डॉ. रविकांत मिश्र ने कहा कि भारत से ही नहीं बल्कि दुनियां भर से आधुनिक जगत में जो सबसे बड़े व्यक्तित्व थे जिनका व्यक्तित्व और कृतित्व सबसे विराट था।
विशिष्ट अतिथि डॉ. विकास पाठक ने कहा कि गांधी जी के अनुसार अंग्रेजी कानून समाज में संघर्षों को बढ़ावा देता था, किसी समस्या को सुलझाना नहीं था। गांधी जी उस समय लोगों को संदेश दे रहे थे कि अंग्रेजियत आपसे श्रेष्ठ नहीं हैं, हमारी सभ्यता अपने आप में इतनी श्रेष्ठ है, कि अंग्रेज हमसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।
इस अवसर पर रजा लाइब्रेरी के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र ने कहा कि लोकरचना कभी संघर्ष से नहीं होती, समन्वय से होती है। समन्वय का मार्ग गांधी का मार्ग है। वसुधैव समन्वय का वही भाव है जो वसुधैव कुटुम्बुकम का है।