नदी जोड़ो मुहिम

दुनिया में उपलब्ध पानी का लगभग चार प्रतिशत ही भारत के पास है। इस पर भी करोड़ों क्यूबिक क्यूसेक पानी हर साल बहकर समुद्र में बर्बाद हो जाता है। देश में बेहतर जल प्रबंधन के लिए नदियों को आपस में जोड़ना महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। समय-समय पर नदी-जोड़ो परियोजना को लेकर चर्चा होती रहती है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को राज्यसभा में कहा कि सबसे पहले गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने नदी जोड़ो मुहिम की शुरुआत नर्मदा नदी के पानी से की। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केन और बेतवा नदी को जोड़ने के प्रोजेक्ट को भी स्वीकृति दे दी गई है।
जल संसाधन मंत्रालय की ओर से कई बार संसद में कहा जा चुका है कि नदी जोड़ो परियोजना वरदान साबित हो सकती है। नदियों को आपस में जोड़ना उन क्षेत्रों से अतिरिक्त पानी को स्थानांतरित करने का एक तरीका है, जहां बहुत अधिक वर्षा होती है। इससे देश के कई हिस्सों में जल संकट को हल करने में भी मदद मिलेगी। परियोजना से जलविद्युत उत्पादन में भी मदद मिलेगी। एक अनुमान के अनुसार यदि पूरी परियोजना को अंजाम दिया जाए तो इससे लगभग 34000 मेगा वाट बिजली पैदा की जा सकती है। जब यह सवाल उठता है कि क्या नदियों को जोड़ने से सूखे और बाढ़ का प्रभाव कम होगा? तो केंद्र सरकार का सीधा जवाब होता है यह बाढ़ और सूखे दोनों को नियंत्रित कर सकता है।
वास्तव में यह अपने किस्म की एक अनूठी योजना है। परियोजना में लगभग 3000 भंडारण बांधों के नेटवर्क द्वारा भारत की 37 नदियों को आपस में जोड़कर जल-अतिरिक्त बेसिन से पानी की कमी वाले बेसिन में पानी के हस्तांतरण की परिकल्पना की गई है। गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली में बाढ़ को नियंत्रित करने के अलावा, यह राजस्थान, हरियाणा और गुजरात के सूखा प्रभावित क्षेत्रों को भी लाभान्वित करेगा। गंगा-ब्रह्मपुत्र में हर साल आने वाली बाढ़ के कारण बिहार और असम सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इसके उप-घटक के तौर पर गंगा की पूर्वी सहायक नदियों को साबरमती और चंबल नदी प्रणालियों से जोड़ना भी लक्षित है।
पर्यावरणविदों को डर है कि यह परियोजना पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बदल देगी। योजना के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी चुनौती विस्थापन एवं पुनर्वास का मुद्दा है। परियोजना एक बड़ी चुनौती तो है ही, लेकिन साथ में यह जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले जल संबंधित मुद्दों को हल करने का एक अवसर भी है। अतः इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है और यह गंभीरता उस हद तक जायज़ कही जा सकती है, जहां नुकसान कम लेकिन फायदे ज्यादा होंगे।