बरेली: बुरे दौर से गुजर रही गांधी की खादी, नहीं मिल रहे खरीदार

बरेली, अमृत विचार। गांधीवाद का प्रतीक बन चुकी खादी इस समय बुरे दौर से गुजर रही है। गांधी आश्रम के उत्पादों की मांग भी कम हो गई है। कोरोना काल में तो स्थिति और भी खराब है। ग्राहक 2 अक्टूबर का इंतजार करते हैं और छूट मिलने पर ही थोड़ी बहुत खरीदारी करते हैं। लेकिन …
बरेली, अमृत विचार। गांधीवाद का प्रतीक बन चुकी खादी इस समय बुरे दौर से गुजर रही है। गांधी आश्रम के उत्पादों की मांग भी कम हो गई है। कोरोना काल में तो स्थिति और भी खराब है। ग्राहक 2 अक्टूबर का इंतजार करते हैं और छूट मिलने पर ही थोड़ी बहुत खरीदारी करते हैं। लेकिन इस गांधी जयंती पर बिक्री न के बराबर हुई।
छावनी स्थित बीआई बाजार में गांधी ग्राम उद्योग पर अनिल कुमार ने बताया कि हर साल काफी संख्या में लोग 2 अक्टूबर को खादी का सामान खरीदने आते थे। लेकिन इस बार बिक्री बिल्कुल शून्य रही है। आश्रम पर कंबलों के अलावा रेशम, मसलिंग खादी, सूती खादी, लिहाफ व गद्दे उपलब्ध हैं, लेकिन ग्राहक नजर नहीं आ रहे हैं।
चार से पांच हजार रुपये प्रतिमाह की होती थी बिक्री
गांधी आश्रम छावनी स्थित बीआई के इंचार्ज अनिल कुमार बताते हैं पिछले वर्ष तक पांच हजार रुपये प्रतिमाह तक की बिक्री हो जाती थी लेकिन कोरोना संक्रमण के बाद से तो स्थिति बेहद खराब हो गई है। यहां तैयार होने वाले कंबलों की बिक्री खादी ग्रामोद्योग विभाग करता है।
खादी महंगा, हैंडलूम सस्ता
खादी के कपड़े हैंडलूम से ज्यादा महंगे है। बाजार में 100 रुपये मीटर कुर्ते पायजामा मिल जाता है। लेकिन खादी का कपड़ा 180 रुपये प्रति मीटर है। जवाहर कट का भी खादी पर हैंडलूम के मुताबिक ज्यादा महंगी है, जो 600 से 700 रुपये तक मिल जाती है। बता दें कि खादी की बिक्री अक्टूबर से जनवरी तक ही होती है, जिसमें करीब 25 प्रतिशत का छूट मिलती है।