ठोस कार्रवाई की आवश्यकता

ठोस कार्रवाई की आवश्यकता

जलवायु परिवर्तन एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता वाला क्षेत्र है। विश्व जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन (कॉप 28) का आयोजन इस बार संयुक्त अरब अमीरात के दुबई में होने जा रहा है। जलवायु सम्मेलन जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और इसे संबोधित करने में दुनिया की सरकारों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों पर चर्चा करने वाला सबसे उच्च प्रोफाइल शिखर सम्मेलन है।

शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 नवंबर से यूएई का दौरा करेंगे। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि आगामी वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलन में जलवायु वित्तपोषण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। मंगलवार को कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने तैयारियों व कृषि क्षेत्र में कार्बन क्रेडिट क्षमता की समीक्षा बैठक की। उन्होंने कहा कृषि प्रौद्योगिकी पर ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि खाद्य प्रणालियां और कृषि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

उम्मीद जताई है कि सम्मेलन के जरिए कृषि क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित होंगी। बता दें कि भारत में संपन्न हुए जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान विश्व नेताओं ने ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने पर सहमति व्यक्त की थी। हालांकि, इसमें कोयला और बिजली समेत प्रमुख जलवायु लक्ष्य को निर्धारित नहीं किया गया था।

भारत की अध्यक्षता में संपन्न हुए जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान लिए गए निर्णय को कॉप-28 आगे बढ़ाने में अहम अवसर प्रदान करेगा। कॉप (सीओपी) की अभी तक कुल 27 बैठकें हो चुकीं हैं। पिछले कॉप 27 का आयोजन नवंबर 2022 में मिस्र के शर्म अल शेख में किया गया था।

कॉप के तहत हर साल एक बैठक आयोजित की जाती है जिसमें दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए योजनाएं बनाते हैं। इसके अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश जलवायु परिवर्तन से निपटने में कारगर उपाय का आंकलन करने और यूएनएफसीसीसी के दिशानिर्देश के तहत जलवायु परिवर्तन के लिए कार्रवाई करते हैं।

बैठक का औपचारिक नाम जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन या संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दलों का कॉन्फ्रेंस है। पहला कॉप-1995 में बर्लिन में आयोजित किया गया था।

इस बार जलवायु प्रभावों, जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लिए वित्तीय सहायता को लेकर अमीर देशों से विकासशील देशों को मुआवजे आदि विषयों पर गहन बातचीत होने की उम्मीद है। मीथेन उत्सर्जन और तापमान बढ़ाने वाली गैस के उत्सर्जन को कम करने का मुद्दा भी उठने की संभावना है। यह सीओपी निर्धारित करेगा कि जलवायु संकट में कम योगदान के बावजूद जलवायु संकट का खामियाजा भुगतने वाले विकासशील और गरीब देशों को सीधे सहयोग कैसे दिया जाए?