वैश्विक महामारी

वैश्विक महामारी

लैंगिक कारणों महिलाओं की हत्या की घटनाएं वैश्विक महामारी का रूप ले रही हैं। मानवाधिकार विशेषज्ञ मॉरिस टिडबॉल बिन्ज ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में बताया कि हजारों लड़कियों व महिलाओं को हर वर्ष उनके लिंग के कारण विश्वभर में जान से मार दिया जाता है जिनमें ट्रांस महिलाएं भी हैं।

बिन्ज ने आगाह किया है कि सदस्य देश लैंगिक हिंसा के पीड़ितों की रक्षा करने के दायित्व में विफल साबित हो रहे हैं। भारत लैंगिक आधारित हिंसा के प्रति काफी संवेदनशील देश है। लैंगिक आधारित हिंसा से संबंधित नीतियों की समीक्षा करने पर पता चलता है कि भले ही भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून मौजूद हैं,लेकिन ये मूल रूप से दंडात्मक प्रकृति के हैं।

नीति निर्धारण प्रक्रिया में लैंगिक आधारित हिंसा से जुड़े कुछ प्रमुख बिंदुओं को अनदेखा कर दिया जाता है, जैसे: पितृसत्तात्मक अवसंरचना, सांस्थानिक ढांचे की अपर्याप्तता, लैंगिक रूप से पक्षपाती धारणाएं जो क्रियान्वयन को प्रभावित करती हैं।

वास्तव में भारत के सामाजिक ढांचे में लैंगिक आधारित असमानताओं की जड़ें काफी गहरी हैं। भारत में महिलाएं भ्रूण हत्या, लिंग निर्धारित गर्भपात, यौन तस्करी, पीछा किए जाने (स्टॉकिंग), दहेज की मांगों, बाल विवाह, एसिड हमले और कथित रूप से सम्मान के लिए की जाने वाली हत्याओं का सामना करती हैं।

लैंगिक हिंसा के ज्यादातर मामलों में अपराधी महिला का ही कोई परिचित पुरुष होता है। भारत ने पिछले 40 सालों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों का समाधान ढूंढने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और महिला उद्यम निधि जैसी योजनाएं शिक्षा और वित्तीय स्वतंत्रता के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए लाई गई हैं।

फिर भी भारत को एक वैश्विक नेता के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर तथा निजी क्षेत्र द्वारा और अधिक ठोस प्रयासों की जरूरत है ताकि महिलाओं को पुरुषों के साथ समानता में लाया जा सके। भारत में जेंडर आधारित हिंसा के खिलाफ लड़ाई में किसी किस्म के दीर्घकालिक और स्थायी सुधार के लिए आवश्यक है कि सामूहिक सोच और धारणाओं में बदलाव लाया जाए।

घरों के भीतर और समाज में महिलाओं के प्रति अवधारणाओं को बदलने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञ ने भी सदस्य देशों से ऐसे कानूनी व प्रशासनिक उपायों को अपनाने का आग्रह किया है जिनसे महिलाओं व लड़कियों के अधिकारों की रक्षा की जा सके। भारत में नीति निर्माण से जुड़ा दृष्टिकोण ऐसा होना चाहिए कि वह इस समस्या के सामाजिक और कानूनी, सभी पक्षों के संतुलन पर आधारित हो ताकि और अधिक स्पष्ट समाधान ढूंढे जा सकें।