दो राजधानियों का औचित्य

आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर के बाद अब उत्तराखंड की गिनती भी दो राजधानियों वाले प्रदेश के रूप में होगी। उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने गैरसेंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया है। राज्य की स्थायी राजधानी फिलहाल देहरादून ही रहेगी। ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होने के बाद गैरसेंण जाहिर …

आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर के बाद अब उत्तराखंड की गिनती भी दो राजधानियों वाले प्रदेश के रूप में होगी। उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने गैरसेंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया है। राज्य की स्थायी राजधानी फिलहाल देहरादून ही रहेगी। ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होने के बाद गैरसेंण जाहिर तौर पर अब राष्ट्रीय पटल पर आ चुका है। उत्तराखंड के एक छोटे से कस्बे को इससे नई पहचान मिलेगी। इसके साथ ही गैरसेंण के आसपास करीब 150 किमी. के दायरे के क्षेत्र में भी विकास होगा, ऐसी उम्मीद जताई जा रही है।

यहां सवाल यह खड़ा होता है कि एक राज्य की दो राजधानियां क्या व्यावहारिक रूप से उचित हैं? दो राजधानियों का राज्य को आखिर क्या फायदा? हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में यह बात और अधिक महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है कि इन दोनों पहाड़ी राज्यों के पास आंध्र, महाराष्ट्र जैसे संसाधन नहीं हैं। दो-दो स्थानों पर राजधानी होने से सरकार पर अरबों रुपयों का अतिरिक्त खर्च भी पड़ेगा।

उत्तराखंड की बात करें तो इस पहाड़ी राज्य का गठन ही पर्वतीय मूल की समस्याओं की वजह से हुआ था। यानी पहाड़ से मूलभूत समस्याएं जैसे बेरोजगारी, स्वास्थ्य, बिजली, पानी का समाधान। इसके साथ ही उत्तराखंड को पर्यटन राज्य के रूप में भी विकसित किए जाने की योजना थी। मगर राज्य बनने के बाद विकास की सारी योजनाएं जैसे पहाड़ चढ़ ही नहीं पाईं। अलग पर्वतीय राज्य बनने के बाद अगर पहाड़ के गांव लगातार खाली हो रहे हैं तो फिर अलग राज्य बनने का क्या औचित्य।

उत्तराखंड का युवा आज महज पांच हजार रुपयों की नौकरी के लिए दिल्ली, देहरादून जाता दिखता है। उसके लिए अलग राज्य का क्या मतलब? अब जबकि गैरसेंण में ग्रीष्मकालीन राजधानी की बातें हो रही हैं तो जाहिर उस क्षेत्र के अलावा आसपास भी रोजगार के अवसर पैदा होंगे। अगर ऐसा होता है तो फिर दो राजधानी की जगह राज्य गठन के वक्त ही स्थायी राजधानी का मुद्दा क्यों नहीं उठा? दो राजधानियों से सरकार को पैसे का नुकसान तो है ही, इससे विकास की रफ्तार भी प्रभािवत होती है।

उत्तराखंड में जनता का एक बड़ा तबका अब भी स्थायी राजधानी और केवल एक राजधानी की मांग कर रह है तो यह जायज ही है। सवाल दो राजधानी बनाने का नहीं बल्कि एक ही जगह से सरकार चलाकर राज्य के विकास की गति को आगे बढ़ाने का है। बहरहाल दो राजधानी की परिकल्पना से राज्य को क्या फायदा होगा यह तो उत्तराखंड की सरकार ही जाने मगर एक छोटे राज्य की दो राजधानियों के औचित्य पर बातें तो होंगी ही।