बन जाते हैं यहां आकर सभी बिगड़े काम! जानिए…70 साल पुराने इस मंदिर में क्या है खास?

बन जाते हैं यहां आकर सभी बिगड़े काम! जानिए…70 साल पुराने इस मंदिर में क्या है खास?

बरेली, अमृत विचार। बरेली शहर में नकटिया और नरियावल सीमा के बीच शाहजहांपुर रोड पर एक 70 वर्ष पुराना बिछ्छिया चोटी मंदिर है। इस मंदिर से पिछले 70 वर्षों से लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। कई पर्वों पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। क्या है मंदिर का इतिहास ये मंदिर …

बरेली, अमृत विचार। बरेली शहर में नकटिया और नरियावल सीमा के बीच शाहजहांपुर रोड पर एक 70 वर्ष पुराना बिछ्छिया चोटी मंदिर है। इस मंदिर से पिछले 70 वर्षों से लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। कई पर्वों पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं।

क्या है मंदिर का इतिहास
ये मंदिर 70 वर्ष पुराना है। यहां 70 वर्ष पहले कभी जंगल हुआ करता था। कहा जाता है कि जहां मंदिर स्थित है वहां पहले एक पाकड़ का पेड़ था। पेड़ के चारों ओर जंगल हुआ करता था। दूर-दूर तक कोई व्यक्ति नजर नहीं आता था।

एक दिन एक साधू घूमते-घूमते उस पेड़ के पास आकर बैठ गए। साधू ने एक दो दिन वहीं रुकने का मन बनाया और ठहर गए। कहा जाता है कि इसके बाद वह साधू हमेशा के लिए वहीं बस गए और पाकड़ के नीचे अपना पूजा-पाठ शुरू कर दिया। धीरे-धीरे जब वह इलाका विकसित हुआ तो लोगों ने साधू के कहने पर वहां एक मंदिर बनवा दिया। मंदिर की देख-रेख साधू ने ही शुरू कर दी।

यहां के लोगों का कहना है कि साधू का नाम पटरी वाले महाराज था। हालांकि ये किसी को नहीं मालूम की उनका नाम पटरीवाले महाराज क्यों पड़ा। कहा जाता है कि साधू के पास ज्ञान का भंडार था, जिसको इस्तेमाल करके वह लोगों की काफी साहयता करते थे।

इसी के कारण मंदिर के आस-पास रह रहे लोगों की साधू से आस्था जुड़ गई और लोगों ने मंदिर आना-जाना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद पटरी वाले महाराज ने समाधि ले ली। इसके बाद भी लोगों ने मंदिर आना-जाना बंद नहीं किया। मंदिर में पटरी वाले महाराज की समाधि पर आज भी लोग मत्था टेकने आते हैं।

लोगों के अनुसार जो भी व्यक्ति अपनी अधूरी इच्छा को लेकर महाराज की समाधि पर मत्था टेकता है उसकी इच्छा पूरी होती है। हालांकि यह एक तर्क है इसकी पुष्टि अब तक नहीं की गई है।

महाराज के बाद किसने की देखरेख
पटरी वाले महाराज के समाधि लेने के बाद से इस मंदिर की देख-रेख एक बाबा ने शुरू कर दी। बताया जाता है कि बाबा का नाम आज तक किसी को पता नहीं चल सका। उन्हें वहां के लोगों ने बाबा जी के नाम से पुकारना शुरू कर दिया। बाबा जी बहुत ज्ञानी थे।

लोगों का मानना है कि बाबा अपने आशीर्वाद से वहां के लोगों की परेशानी को खत्म कर देते थे। जिसके कारण लोगों को उनसे बहुत स्नेह हो गया था। समय के साथ-साथ मंदिर में दूर-दूर से लोग दर्शन के लिए आने लगे।

उसके बाद नरियावल गांव के लोगों ने वहां हर साल होली के त्योहार पर अपनी एक चौपाल लगाना शुरू कर दी जिसकी परंपरा अब तक चली आ रही है। चौपाल में नरियावल के लोग ढोल नगाड़ों के साथ मंदिर पर आते हैं और भगवान के कीर्तन और भजन करके पर्व मनाते हैं।

आज से करीब 7 से 8 साल पहले बाबा जी ने भी समाधि ले ली। जिसके बाद लोग काफी उदास हो गए बाबा को लोग बहुत मानते थे। अब इस मंदिर की देख रेख गोपालानंद महाराज कर रहे हैं ।

किस-किस पर्व पर लगती है मंदिर में कतार
मंदिर पर शिवरात्री, सावन, नवरात्र और हनुमान-जयंती पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। दूर-दूर से लोग शंकर जी पर जल तो माता रानी पर प्रसाद चढ़ाने आते हैं।

खासकर होली पर नरियावल गांव के लोग बड़ी संख्या मे चौपाल लेकर मंदिर आते हैं और भजन करते हुए खूब धूम-धाम से त्योहार मनाते हैं।

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