इस मंदिर में देवता की नहीं असुर की होती है पूजा, प्रसाद में बनती है नमकीन खीर

देवभूमि उत्तराखंड की महिमा अपरंपार है। यहां देवों के धाम तो हैं ही साथ ही ऐसे मंदिर भी हैं जहां दानवों की भी पूजा की जाती है। पिथौरागढ़ में सिलथाम बस अड्डे के सामने असुराचूल नाम की चोटी में असुर देवता का वास स्थल माना जाता है। असुरचूल के अलावा खड़ायत पट्टी और गौरंग देश …
देवभूमि उत्तराखंड की महिमा अपरंपार है। यहां देवों के धाम तो हैं ही साथ ही ऐसे मंदिर भी हैं जहां दानवों की भी पूजा की जाती है। पिथौरागढ़ में सिलथाम बस अड्डे के सामने असुराचूल नाम की चोटी में असुर देवता का वास स्थल माना जाता है। असुरचूल के अलावा खड़ायत पट्टी और गौरंग देश में मोष्टा देवता के साथ इसके भी जागर लगाए जाते हैं।

चंडाक के पास असुराचूल का देवस्थल एक पहाड़ी की चोटी पर खुले आकाश के नीचे है। एक लंबी पत्थर की शिला को उसका प्रतीक मानकर यहां पूजा की जाती है। यहां खीर का प्रसाद चढ़ाया जाता है, इस खीर में मीठे की जगह नमक डाला जाता है। पूजा के मौके पर वाद्यों के साथ सिर्फ तांडव नृत्य किया जाता है।
प्रचलित कथा के अनुसार, असुर देवता के रूप में पूजे जाने वाले यह देव किसी असुर देवता कन्या से उत्पन्न इन्द्रदेव की संतति था। बड़ा होने पर जब यह इंद्र देव के पास अपना अधिकार मांगने गया तो उन्होंने इसे अपना पुत्र मानने से मना कर दिया। जब अपना अधिकार मांगने के लिए जिद करने लगा तो इंद्र ने उसे खत्म करने के लिए वज्र से प्रहार किया। वज्र उसे बिना नुकसान पहुंचाए बिना इंद्र के पास वापस चला आया। तब मजबूरन इंद्र को उसे अपना पुत्र स्वीकार करना पड़ा और उसे इस क्षेत्र का आधिपत्य देकर भेज दिया। मान्यता है कि इसकी पूजा करने से यह ओलावृष्टि कर फसल को फायदा पहुंचाता है।