दावा अयोध्या को पर्यटन नगरी बनाने का…लेकिन इन धरोहरों की हो रही उपेक्षा

अयोध्या। अयोध्या को देश की सबसे बड़ी पर्यटन नगरी बनाने की कवायदें जरूर चल रही हैं, लेकिन हकीकत तो यह है कि कई पुरातात्विक धरोहरें उपेक्षा का शिकार होती जा रही है। सरकारी तंत्र भी इन्हें सहेजने में कोई खास रुचि नहीं दिखा रहा है। इन्हीं में से एक चौक घंटाघर है। इसकी घड़ियां भी …
अयोध्या। अयोध्या को देश की सबसे बड़ी पर्यटन नगरी बनाने की कवायदें जरूर चल रही हैं, लेकिन हकीकत तो यह है कि कई पुरातात्विक धरोहरें उपेक्षा का शिकार होती जा रही है। सरकारी तंत्र भी इन्हें सहेजने में कोई खास रुचि नहीं दिखा रहा है। इन्हीं में से एक चौक घंटाघर है। इसकी घड़ियां भी आज डिजिटल युग में बेरुखी महसूस कर रही हैं। कभी चारों दिशाओं में लगी घड़ियों से लोग अपना समय मिलाते थे, लेकिन आज उससे नजरें मिलाने से भी कतराने लगे हैं। क्योंकि वह समय नहीं बता पा रही है। जब भी किसी का दुर्दिन चल रहा होता है लोग कहते हैं लगता है कि समय खराब चल रहा है, लेकिन यहां तो घंटाघर का ही समय खराब चल रहा है।
ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल घंटाघर लगभग 125 साल की अवस्था पूरी कर चुका है। बताते हैं कि देखरेख के अभाव में इस ऐतिहासिक धरोहर की सांसे कई बार थमीं। नगर पालिका में मौजूद आंकड़ों के मुताबिक बंद हुए घंटाघर की मरम्मत वर्ष 2000 में कराई गई थी। कुछ दिनों तक घड़ी चलने के बाद फिर बंद हो गई। कारीगर न मिलने के कारण महीनों टिक-टिक की आवाजें नहीं सुनाई पड़ीं। 2001 में पालिकाध्यक्ष रहे विजय गुप्ता ने ठीक कराया।
बरेली से आए कारीगरों ने ठीक तो किया, लेकिन कुछ महीने बाद यह घड़ियां फिर से बंद हो गईं। वर्ष 2009 में एक बार फिर नगर पालिका ने लखनऊ से कारीगर बुलाकर इसे ठीक कराया, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला रहा। इसके बाद पैंडुलम घड़ियों की जगह बैटरी वाली घड़ियां लगा दी गर्इं। यह काम भी पालिकाध्यक्ष रहे विजय गुप्ता ने कराया था। उन्होंने बताया कि मरम्मत से लेकर घड़ी बदलवाने तक में लाखों रुपये खर्च हो गए थे। मेरी प्राथमिकता रहती थी कि शहर की तस्वीर बदले।
इस बारे में नगर निगम के अपर आयुक्त सच्चिदानंद सिंह का कहना है कि घंटाघर की घड़ी ऐतिहसिक धरोहर है। इसके मूल रूप में बदलाव किए बिना घड़ी को दुरुस्त कराए जाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि घड़ी कब से बंद है इसकी जानकारी नहीं है। चौक क्षेत्र के व्यापारियों की माने तो घंटाघर की यह ऐतिहासिक घड़ी बड़ी धरोहर है इसकी देखभाल होनी चाहिए।
नवाब शुजाऊदौला की गुलाबबाड़ी भी उपेक्षा से मुरझाई
नवाब शुजाऊदौला द्वारा बनवाई गई ऐतिहासिक गुलाबबाड़ी भी उपेक्षा का शिकार है। यहां भीतरी भवनों की हालत जर्जर तो हो ही गई है साथ ही फव्वारे और बगीचा भी बदहाल है। गुलाबबाड़ी के परिसर में बच्चों के लिए बने झूले खराब हो चुके हैं। भीतरी इमारत की दीवारों पर शोहदे किस्म के लड़कों ने अश्लील इबारतें लिख कर स्वरूप बिगाड़ रखा है। परिसर के भीतर अशोक की लाट के अगल-बगल ईंटों का ढेर लगा है। इमामबाड़ा और मस्जिद के भवन को मरम्मत की दरकार है लेकिन कई सालों से नहीं हुई। यहां आने वाले लोग भी गुलाबबाड़ी को दुरुस्त कराए जाने की मांग कर रहे हैं।
मुतवल्ली मेंहदी हसन का कहना है कि कई बार पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन को पत्र लिखकर मांग की गई लेकिन कुछ हुआ नहीं। उन्होंने बताया सात सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों के स्थान पर कोई भर्ती नहीं हुई, महज आठ कर्मचारी देखभाल के लिए बचे हैं। उन्होंने बताया कि गुलाबबाड़ी परिसर के बाहर दीवार के निकट ही कूड़ा घर बना दिया गया है। यहां शुजाऊदौला का मकबरा भी है जिसकी दशा बेहद खराब हो चुकी है।
बहू बेगम का मकबरा का भी कोई नहीं पुरसाहाल
इसी तरह बबहू बेगम का मकबरे का भी कोई पुरसाहाल नहीं है। यहां की जिम्मेदारी सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय के अधीन है। बाहर से अंदर को जाने वाली सड़क तो जर्जर है ही इसके अलावा अंदर मकबरे की इमारत भी खस्ता है। दस साल पहले थोड़ी बहुत मरम्मत हुई थी, लेकिन तब से आज तक पुताई तक नहीं हुई। यहां भी लोग अवैध रूप से रह रहे, जिससे अव्यवस्था फैलती है। मुख्य प्रवेश द्वार के अगल बगल भी लोगों ने कब्जा कर रखा है। ऐसे में ऐतिहसिक धरोहरें अपनी पहचान खोती जा रहीं हैं। यहां बेगम उम्मुत जहरा का मकबरा है जिन्हें बहु बेगम के नाम से जाना जाता है।
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