कलम और तलवार

कलम और तलवार

जिसके पास जो रहता है उसे लेकर वह लड़ता है। जीतता है कि हारता है, मारता है कि मारा जाता है, इसका कोई विशेष मतलब नहीं, क्योंकि लड़ाई के दोनों घोर पहलू एक दिन मौत में समाकर सम हो जाते हैं। देखने लायक रोचक चीज लड़ाई का वह हथियार या असलहा है जिसे लेकर नत्थू-खैरू …

जिसके पास जो रहता है उसे लेकर वह लड़ता है। जीतता है कि हारता है, मारता है कि मारा जाता है, इसका कोई विशेष मतलब नहीं, क्योंकि लड़ाई के दोनों घोर पहलू एक दिन मौत में समाकर सम हो जाते हैं। देखने लायक रोचक चीज लड़ाई का वह हथियार या असलहा है जिसे लेकर नत्थू-खैरू से लेकर राम-परशुराम जैसे योद्धा, सिकंदर-नैपोलियन जैसे पराक्रमी, भारत-पाकिस्तान ही नहीं, अमरीका-रूस जैसे देश लड़ते हैं।

राज्य-साम्राज्य के लिए, जमीन-स्त्री के लिए राजनैतिक या वैयक्तिक लड़ाइयां तो होती ही हैं और उनमें हथियारों के प्रकारों और पकड़ते हाथों के लाघवों और कौशलों पर ध्यान जाता ही है, पर रोचक बात देखने की हमेशा यह अलग से पड़ी रहती है कि चरम हथियारों की मौजूदगी और उनके प्रदर्शनों के बावजूद हथियारों में तलवार की जगह कोई दूसरा हथियार ले नहीं सका है।

लड़ाई की भाषा में तलवार को बेदखल करने का साहस किसी दूसरे शस्त्र की संज्ञा में आज तक पैदा नहीं हुआ। ऊंचे सेनाधिकारियों की कमर में यह आज भी औपचारिक मौकों पर निष्प्रयोज्य होकर भी खुंसी रहती है। परेड और सलामी में टुकड़ी के नायक के हाथ में इसी की भंगिमाओं पर शौर्य का सारा नुमाइशी तमाशा खड़ा होता है और चलता है।

तलवार के नाम में वीरत्व की जो धमक, धाक, खौफ, आतंक, राजत्व है वह किसी दूसरे शस्त्र में नहीं। लेकिन दुनिया में पैदा हर आदमी को चप्पे-चप्पे पर हर क्षण जो लड़ाई लड़नी पड़ती है, वह केवल तलवार से ही नहीं लड़ी जा सकती। तब उन वीरों का ख्याल आए बिना नहीं रहता जो हल, फावड़ा-कुल्हाड़ी, कुदाल-खुरपी-हंसिया, लाठी-डंडा, सोटा-पैना-रूल-छड़ी से लड़ते, जूतमपैजार कर लड़ते, सुई, नहनी-उस्तरा-कैंची, रसोई के चाकू, सरौता, चिमटा-संड़सी, बेलन, मूसल, लोढ़ा से लड़ते, हाथ-लात-दांत से लड़ते, कलम से लड़ते गुजर गए और गुजरते जाते हैं।

हथियार जब औजार या उपकरण या साधन का रूप ले लेता है तो उसकी बात ही और हो जाती है, निराली हो जाती है। इन भले और जिंदगी के सुख-दुख से रोजाना के हिसाब से हर पल जुड़े हथियारों की शक्ल के औजारों में कलम की महिमा सबसे अलग और पेचीदी होते हुए भी अपनी भारी भूमिका के कारण बड़ी व्यापक हो जाती है।

आज के समय में कलम का स्थान अंगुली और बटन या बटन के रूप मे चिह्न ने ले लिया हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, वह कलम ही का विस्तार है। कलम का स्थान तलवार की तरह ही कयामत तक अक्षुण्ण और अपरिवर्तनीय है। अनुल्लंघनीय है। बल्कि कलम के हथियार में प्रतिभा की जो प्रभा, पुट है वह तलवार को कभी मयस्सर न हुई, नसीब न हुई। न हो सकती है। साधारण लिखा-पढ़ी में कलम का जो प्रयोग है वह भैंसे या बैल को गाड़ी या हलवाही में जोतने जैसा प्रयोग है, उसका उसके व्यक्तित्व के अनुरूप प्रयोग तो जंगली भैंसे या सांड़ की तरह छुट्टा, स्वच्छंद विचरण में है। कलम का हथियार खटने के लिए नहीं बना है, वह तो खण्डों, काण्डों, सर्गों, अंकों, अध्यायों में बंटे महाकाय काव्यों, नाटकों, उपन्यासों, दर्शनों, शास्त्रों को लिखने के लिए बना है।

साथ ही इन विशाल प्रबंधों के माध्यम से मनुष्य की चेतना पर छा जाने और हमेशा के लिए अमिट छाप छोड़ देने के लिए बना है। रसविभोर करने के लिए ही नहीं, जनसंघर्ष उकसाने, मनचाही क्रांति की भूमिका तैयार करने, दुनिया बदल देने की ऐंठन पैदा करने के लिए भी वह बना है। तलवार से लेकर नहनी और सुई तक के हथियारों में कलम की बराबरी करने का सामर्थ्य किसी में नही है। कलमधारी लेखक-कवि के सामने लाठी-डंडा रखने वाले लग्गू-भग्गू से लेकर समस्त शस्त्रास्त्रों से लैस किसी भी शैली के तानाशाह या प्रजा-प्रेमी शासक में टिकने की कुव्वत भी नहीं है।

इतिहास लेखक, पुराण लेखक, गल्प लेखक, उपदेश लेखक, कवि न होते तो शासकों, राजाओं, देवताओं, लोकपालों, दिग्पालों, प्रवर्तकों का कुछ अता पता भी न चलता। उपलब्धि के नाम पर दूसरों के कब्जे में सिसकते खंडहरों के सिवा कुछ और न मिलता। किम्वदन्ती ही मिलती। लेकिन लेखकों, कवियों की कृतियां तो जिंदा उपलब्धियों की तरह कालजयी होकर सहस्राब्दियों तक सफर करती हैं, अपने प्रभाव का रंग जमाती हैं और कभी-कभी तो अपने रचना-समय से ज्यादा प्रसिद्ध होकर ज्यादा चटक रंग में चमकती हुईं बाद के समय में उभरतीं हैं।

यहां तक कि अपनी प्रभविष्णुता से परवर्ती समधर्माओं को हदसातीं भी हैं। मानदण्ड की तरह, प्रकाश-स्तम्भ की तरह मार्गदर्शन और दिग्दर्शन भी करतीं हैं। जीवित पगचिह्न की तरह कैसे चलना चाहिए, उस तरह चलने को सिखाती हुईं, ललचाती हुईं भी अपनी तरह चलने को, अपनी रोशनी आप बनने को बतातीं भी हैं।

कलम और कलम चलानेवालों की दुनिया में भी और दुनियावों की तरह शूरवीर ही नहीं पाए जाते, आंख के धनी और कलाकुशल ही नहीं पाए जाते, कायर, आंख से फूटे, काने, संवेदना-बधिर, भावशून्य, कर्कश और कलाविहीन फूहड़ भी पाए जाते हैं। शोहदे और लीचड़ तो पाए ही जाते हैं। गवाही से मुकर जाने वाले, दुम हिलाने और दुम पेट में दबा जाने वाले, बोलने के अवसर पर चुप लगा जानेवाले, अनपेक्षित मौकों पर बालू में मूड़ी धंसा देनेवाले, बालू का किला बनाने वाले, मनोविकारों नहीं, मनोरोगों से ग्रस्त लोग भी इस दुनिया में पाए जाते हैं।

इसलिए साहित्य की दुनिया में लिखा हुआ थोड़ा ही ऐसा बचता है जो संग्रहणीय होता है। समय के लम्बे सफर में कूच कर चलने लायक होता है, दानेदार, पाएदार और टिकने लायक होता है। ज्यादातर लेखन देखा-देखी और उस आदिम प्रवृत्ति पर पैर रोप कर होता है कि कारगर और समयानुरूप हथियार नहीं है तो क्या, लात घूंसा तो है, ईंट-पत्थर कहीं गए नहीं हैं, हमारे पास जो है, हम उसी से लड़ेंगे। हम भी लड़ेंगे, जरूर ही लड़ेंगे। बहुत सारा लेखन इसी तर्ज पर होता है।

मजे की बात यह भी है कि ऐसे ही लेखनों का, खासकर कविताओं का हर जमाने में बड़े पैमाने पर भीड़ भरे फैलाव में मजा भी लिया जाता है। ऐसे कवियों की एक और परिणति झुण्ड के रूप में उस थोक पतन में होती है जब वे अपनी विशिष्टता यानी वैयक्तिक अभिव्यक्ति और अभिव्यंजना की भाषिक विभा खोकर एक समान स्याह रंग में अदृश्यमान हो जाते हैं। लक्षित होने का जोरदार समारोह रखते हुए भी अलक्षित हो जाते हैं। कविता का यह अंधा युग होता है।

अत: सिद्ध होता है कि दूसरे मानवीय क्षेत्रों की तरह कविता आदि के साहित्यिक क्षेत्र में भी जिसके पास जो होता है उसे लेकर वह लड़ता है। इस दुनिया में भी अपने हथियारों और औजारों को लेकर कोई उसके छोटेपन पर, ठिगनेपन पर, या उसके सरासर अभाव पर नहीं जाता, लजाकर घर बैठ नहीं जाता। आंख मूंदकर उसे चलाता है। यह ध्यान रहे कि अंतिम शस्त्र हाथ-पांव ही होता है। जीवन निरंतर युद्ध है, विभिन्न किस्म की एक साथ छिड़ी लड़ाइयों का विचित्र मैदान है। साहित्य जीवन से बाहर नहीं है। साहित्य का संघर्ष उस व्यापक युद्ध-मैदान के भीतर ही है।

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