बरेली: जागरण पार्टी और सूफी कव्वाली से जुड़े कलाकारों पर रोजगार का संकट

बरेली, अमृत विचार। महामारी ने हर वर्ग को आर्थिक चोट दी है। अधिक संख्या में लोक कलाकार भी रोजगार के संकट से गुजर रहे हैं। कोविड दिशा निर्देशों के मुताबिक ही धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन किए जा रहे हैं। इसकी वजह से इन आयोजनों में अपनी कला का रंग बिखेरने वाले कलाकार मुश्किल में हैं। …

बरेली, अमृत विचार। महामारी ने हर वर्ग को आर्थिक चोट दी है। अधिक संख्या में लोक कलाकार भी रोजगार के संकट से गुजर रहे हैं। कोविड दिशा निर्देशों के मुताबिक ही धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन किए जा रहे हैं। इसकी वजह से इन आयोजनों में अपनी कला का रंग बिखेरने वाले कलाकार मुश्किल में हैं। महामारी से पहले जागरण की चौकियां, सूफी कव्वाली महफिलें, मुशायरे और कवि सम्मेलन आम बात थे, मगर अब सब सूना है।

सूफी कव्वाली और जागरण करने वाले कालाकार एक कार्यक्रम के 10 से 40 हजार रुपए लिया करते थे। एक कार्यक्रम में 10 से 15 लोगों कलाकारों की मंडली होती है। संगीतकार, गायक, झांकियों वाले ऐसे बहुत सारे लोग पारंपरिक लोक कलाओं से घर गृहस्थी चलाते हैं लेकिन महामारी के बाद से केवल अपनी कला के जरिए जीवन यापन करने वालों के पास काम नहीं है। ऐसे में कई कलाकारों ने रोजगार बदल दिए हैं। स्थिति यह है कि कोई फल बेच रहा है तो किसी ने ऑटो चलाना शुरू कर दिया।

मुशायरों और कवि सम्मेलनों में जान फूकने वाले शायरों और कवियों का कहना है कि महामारी काल के दौरान काफी साहित्य लिखा गया है लेकिन कार्यक्रम नहीं होने से श्रोताओं तक नहीं पहुंचा पाया है। इनकी सरकार से भी नाराजगी है। उनका कहना है कि कलाकारों की इस स्थिति को देखते हुए सरकार को कुछ करना चाहिए। नहीं तो आने वाले दिनों में हालात और भी खराब हो सकते हैं।

इनकी सुनें

दुर्गा जागरण, भागवत कथा जैसे आयोजन नहीं होने से मंडली से जुड़े कलाकारों के आगे रोजगार का संकट पैदा हो गया है। कलाकारों की गृहस्थि भी इसी पर चलती है। एक कार्यक्रम का 15 से 20 हजार रुपए लेते हैं। केवल एक मंडली से 8 से 10 लोगों का रोजगार भी जुड़ा होता है। मगर अब काफी मुश्किल पैदा हो चुकी है। -आचार्य सुनील, कथावचक

खानकाहों और दरगाहों के अलावा निजी पार्टियों में भी कव्वाली के कार्यक्रम करते हैं मगर अब महामारी के चलते कार्यक्रम मिलने बंद हो गए हैं। ढोलक, तबला जैसे वाध्य यंत्र बजाने वाला साथी कलाकारों को काम बदलने की नौबत आन पड़ी है। सरकार को कलाकारों के बारे में भी सोचना चाहिए। अगर काम नहीं मिल रहा तो उनके रोजगार के लिए कोई दूसरा इंतजाम किया जाए। -नसीम आरिफ, सूफी कव्वाल गायक

पहली लहर के बाद बमुश्किल कार्यक्रम मिलना शुरू हुए थे लेकिन दूसरी लहर ने दोबारा सब सिफर कर दिया। आखिरी बार अप्रैल में एक कार्यक्रम किया था। हालात यह हैं कि अब बेटे को ऑटो चलाना पड़ रहा है। फिलहाल जैसे-तैसे घर का गुजारा चल रहा है। -नाजमा परवी, कव्वाली गायिका

महामारी से पहले सबकुछ ठीक चल रहा था। किसी भी शहर की बुकिंग मिलने के बाद कार्यक्रम करते थे मगर अब कलाकारों को काम नहीं मिलने की वजह से आर्थिक स्थिति बिगड़ गई है। घर बैठकर कितने दिन खाया जा सकता है। साथ में काम करने वाले संगीतकारों की स्थिति अधिक बदतर है। -आलिया इंडियन, कव्वाली गायिका

महामारी ने कवियों और कलाकारों को आर्थिक परेशानी में डाल दिया है। कला और संस्कृति को जीवित रखने के लिए कलाकारों का पेट भरा होना बेहद जरूरी है। कवि और कलाकार को पेट से ज्यादा बड़ी भूख श्रोताओं के सामने प्रस्तुति की होती है। ऐसे में उनके अंदर काफी बेचैनी है। कवियों ने इस काल में काफी साहित्य लिखा है जो दुर्भाग्यवश महामारी के कारण श्रोताओं तक नहीं पहुंच पाया है। -रोहित राकेश, कवि