बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए न्यूनतम कराधान सुनिश्चित करने पर जी20 बैठक में चर्चा

गांधीनगर। जी20 देशों के वित्त मंत्रियों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों का उनके परिचालन वाले देशों में न्यूनतम कर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए मंगलवार को वैश्विक कर मानदंडों में व्यापक बदलाव से जुड़ी रणनीति पर चर्चा की। जी20 समूह के सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों एवं केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों की यहां आयोजित बैठक के दूसरे दिन निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों को कर्ज के भारी बोझ से राहत दिलाने के तरीकों पर भी विचार-विमर्श किया गया।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में हुई बैठक में कंपनियों के अंतरराष्ट्रीय कराधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए संबंधित पक्षों से विचार भी आमंत्रित किए गए। इससे कर चोरी पर लगाम लगाने के उपाय लागू करने में मदद मिलेगी। वित्त मंत्रालय ने एक ट्वीट में कहा कि 'द्वि-स्तंभ समाधान' लागू करने और वैश्विक कर पारदर्शिता बढ़ाने के लिए क्षमता निर्माण की रणनीतियों पर चर्चा के लिए वित्त मंत्रियों और गवर्नरों को आमंत्रित किया गया था। प्रस्तावित द्वि-स्तंभ समाधान में दो घटक शामिल हैं।
इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लाभ के अतिरिक्त हिस्से को उनके परिचालन वाले बाजार क्षेत्रों में दोबारा निवेश करने का प्रावधान किया गया है। इसका दूसरा घटक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए न्यूनतम 15 प्रतिशत का वैश्विक कर रखने से संबंधित है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने पिछले सप्ताह कहा था कि कुछ देशों ने बहुपक्षीय समझौते (एमएलसी) में कुछ विशिष्ट उत्पादों को लेकर चिंता व्यक्त की है। ओईसीडी ने कहा था, एमएलसी को हस्ताक्षर के लिए जल्द तैयार करने के मकसद से इन मुद्दों को हल करने की कोशिश जारी है।
भारत ने जी20 देशों से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है कि प्रस्तावित वैश्विक न्यूनतम कर समझौते के किसी भी 'अनपेक्षित परिणाम' से विकासशील देशों को सुरक्षित रखा जाए। कराधान के लिए जी20 समावेशी ढांचे में विकासशील देशों की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है। वित्त मंत्रालय ने एक अन्य ट्वीट में कहा कि मंत्रियों और गवर्नरों ने जी20 साझा प्रारूप की दिशा में हुई प्रगति और सबसे अधिक जरूरतमंद देशों के लिए ऋण बोझ कम करने के त्वरित समाधान के तरीकों पर चर्चा की।
जी20 समूह के अध्यक्ष के तौर पर भारत भू-राजनीतिक तनाव और कोविड-19 महामारी से विकासशील देशों के सामने आने वाली गंभीर ऋण कमजोरियों से निपटने के तरीके अपनाने के लिए दबाव डाल रहा है। दरअसल ऐसी आशंका है कि इस दिशा में ध्यान न दिए जाने पर विकासशील देशों की बढ़ती ऋण दुर्बलता वैश्विक मंदी को जन्म दे सकती हैं और लाखों लोगों को अत्यधिक गरीबी की ओर धकेल सकती हैं।
विश्व बैंक ने गत दिसंबर में कहा था कि दुनिया के सबसे गरीब देशों पर 62 अरब डॉलर की कर्ज देनदारी बकाया है। यह वर्ष 2021 के बकाया कर्ज 46 अरब डॉलर से 35 प्रतिशत अधिक है। ऐसा होने से कर्ज भुगतान में चूक का जोखिम भी बढ़ गया है।
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