किसी के होठों पर लाएं मुस्कान, बिना मंदिर के मिल जाएंगे भगवान

किसी के होठों पर लाएं मुस्कान, बिना मंदिर के मिल जाएंगे भगवान

सावन का महीना चल रहा है। कोरोना न होता तो मंदिरों में तिल रखने जगह न होती। मंदिर परिसर बेल पत्री, फूलों, फलों से अटे पड़े होते। सबसे ख़राब तो मुझे ये लगता है जब कोई भक्त सीधे पैकेट से शिव जी पर दूध चढ़ाकर नाली में बहा देता है। काश! वो दूध किसी ज़रूरतमंद …

सावन का महीना चल रहा है। कोरोना न होता तो मंदिरों में तिल रखने जगह न होती। मंदिर परिसर बेल पत्री, फूलों, फलों से अटे पड़े होते। सबसे ख़राब तो मुझे ये लगता है जब कोई भक्त सीधे पैकेट से शिव जी पर दूध चढ़ाकर नाली में बहा देता है। काश! वो दूध किसी ज़रूरतमंद को मिल जाता। वो फल सड़ने के बजाय किसी भूखे का पेट भरते। मंदिरों के चढ़ावे से गरीबों का कुछ भला होता।

ईश्वर, आस्था, धर्म, विश्वास बेहद निजी हैं। इतनी निजी जितनी हमारी आत्मा, मन, दिल और शरीर हैं। सारा दिन खाली गपशप न करके, खूब मेहनत से घर बाहर के काम करके जो मानसिक सुख और सुकून मिलता है वह शायद घंटों पूजा करके भी न मिले। मैंने ऐसे बहुत से लोग देखे हैं जिन्होंने अपने जीवन के घंटों पूजा-पाठ में बिताे हैं पर उन्हें एक पल का भी सुख -चैन नसीब नहीं हुआ। कुछ ऐसे भी हैं जिनको मैंने कभी पूजा करते नहीं देखा पर उन्हें कोई दुख नहीं , हर तरह से सुखी हैं। मेरा मतलब आडंबर से है।

एक भूखे इंसान को भोजन कराना, किसी ज़रूरतमंद की मदद करना ,किसी गरीब छात्र की फीस देना ये सब आपकी पूजा ही है। मंदिर में सोने की बाल्टी चढ़ाना, लाखों करोड़ों का हीरा भेंट करना, करोड़ों का दान देने से श्रेयस्कर है कि आप किसी गरीब लड़की की शादी कराएं, किसी दिव्यांग को उसके अंग लगवाएं, किसी की आंखों का नूर वापस लाएं

मेरी बचपन से साधू -संन्यासियों पर अंध श्रद्धा कभी नहीं रही। पिताजी को कभी मंदिर जाते नहीं देखा। हां, अपना हर काम समय पर ज़िम्मेदारी और नियम से करते देखा है| क्या यही उनकी पूजा थी। मां को भी मंदिर मंदिर भगवान को ढूंढते नहीं देखा है। उन्हें सुबह से शाम तक काम करते देखा है। शायद यही उनकी आराधना थी। हम सब भाई बहन भी नास्तिक नहीं थे। हमारे भगवान हमारे कामों में थे। हमें माता -पिता ने सच बोलना, ईमानदार होना और अच्छा इंसान बनना सिखाया।

‌मैं एक बहुत साधारण घरेलू महिला हूं। घर के कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती है। साल में एकाध बार ही मंदिर जा पाती हूं। ईश्वर को पाने के लिए मंदिर जाना जरूरी नहीं मेरे हिसाब से। कला की दृष्टि से मंदिरों को देखा जाना अलग बात है। बिना मंदिर जाये भी आप अपने छोटे छोटे अच्छे कामों से भगवान के बहुत करीब आ सकते हैं।उनसे अपना रिश्ता या संवाद बना सकते हैं। सुकून से जी सकते हैं, खुश रह सकते हैं| मैंने अपने प्रभु को खोज लिया है।” मोको कहां ढूंढो बन्दे, मैं तो तेरे पास हूँ ” अगर आप महसूस कर सकें तो वो हर छोटी से छोटी चीज़ में हैं। हर कण में भगवान हैं।

मैंने मंदिर में माला चढ़ाना, प्रसाद चढ़ाना छोड़ दिया है। वो पैसे मैं किसी गरीब रिक्शे वाले को देकर ज्यादा सुकून महसूस करतीं हूं। मंदिर में पैसे न चढ़ाकर, बाहर आकर किसी ज़रूरतमंद को दे देतीं हूं। मंदिर में चढ़ाई गयीं चुन्नियां और नारियल वापस उन्हीं दुकानों पर पहुँच जाते हैं| हम और आप किसी और का चढ़ाया हुआ नारियल और चुनरी लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं।

कर्म ही पूजा होनी चाहिए। गांधी जी से अच्छा उदाहरण और कोई नहीं| वे कहते थे कि कर्म के आलोक से जीवन को प्रकाशित होना चाहिए। लाखों, करोड़ों के चढ़ावे के बाद भी क्या कोरोना में बड़े बड़े मंदिरों का कुछ भी योगदान है? इसलिए दान बहुत सोच समझ कर देना चाहिए।अपने हाथ से किसी सुपात्र को दिया गया दान सर्वश्रेष्ठ है। गुरुदेव की गीतांजलि के गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रहीं हैं:
‌उद्यम में रत होकर , श्रम से अवनत होकर /
‌मस्तक से , भौहों से, स्वेद को समेट ले,
‌उठ प्रभु से भेंट ले !!!

-रंजना नायक