चुभते सवाल

लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में पुलिस कार्रवाई में सुस्ती बरतने के चलते उत्तर प्रदेश सरकार को उच्चतम न्यायालय के तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। अदालत ने पूछा कि क्या हत्या के अन्य मामलों में भी पुलिस आरोपियों को नोटिस भेजकर बुलाती है? केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे को अब तक गिरफ्तार न किए जाने का आधार क्या है? उच्चतम न्यायालय ने जानना चाहा कि आप क्या संदेश दे रहे हैं। अगर आरोपी कोई आम आदमी हो तो क्या यही रवैया रहेगा?

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लखीमपुर खीरी में रविवार को उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के दौरे के विरोध को लेकर भड़की हिंसा में चार किसानों समेत आठ लोगों की मौत हो गई थी। इस मामले में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष समेत कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। उच्चतम न्यायालय को दो वकीलों की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। सरकार की ओर से आज स्थिति रिपोर्ट पेश की गयी, जिससे न्यायालय संतुष्ट नहीं हुआ।

उत्तर प्रदेश की सरकार और पुलिस के विरुद्ध न्यायपालिका आए दिन अपने गुस्से का इजहार कर रही है। अभी हाल में शीर्ष अदालत और इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कुछ मामलों को लेकर उत्तर प्रदेश की पुलिस के विरूद्ध सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एक 19 साल पुरानी मुठभेड़ के मामले में कार्रवाई नहीं होने पर नाराजगी प्रकट की है।

अदलत ने टिप्पणी की कि यह मामला इसका एक उदाहरण है कि राजसत्ता आरोपी पुलिसकर्मियों का बेशर्मी की हद तक बचाव करती है। उधर तिकुनिया कांड के बाद घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि कानून हाथ में लेने की छूट किसी को नहीं होगी लेकिन किसी के दबाव में कोई कार्रवाई नहीं होगी।

सवाल प्रधानमंत्री की चुप्पी पर भी उठ रहे हैं। आरोप लग रहे हैं पुलिस ने मुख्य आरोपी को तलब करने की केवल औपचारिकता की और आरोपी क्राइम ब्रांच की टीम के सामने पेश नहीं हुआ। शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि लखीमपुर खीरी में लोगों की निर्मम हत्या की गई। हम ज़िम्मेदार सरकार चाहते हैं।

मामले की पूरी संवेदनशीलता, गंभीरता और तत्परता से जांच की जाये। और मामले से जुड़े सबूतों को सुरक्षित रखा जाए। इस मामले में न्यायालय का आकलन किसी संवेदनशील सरकार के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता है। यह एक चेतावनी है कि हमारे लोकतंत्र का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है।

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