नैनीताल: सरोवर नगरी में सबसे पहले 1956 में हुआ था दुर्गा पूजा महोत्सव

नैनीताल: सरोवर नगरी में सबसे पहले 1956 में हुआ था दुर्गा पूजा महोत्सव

नैनीताल, अमृत विचार। सरोवर नगरी में सर्ब जनिन दुर्गा पूजा कमेटी के तत्वावधान में इस बार 66वां दुर्गा पूजा महोत्सव एक अक्टूबर से पांच अक्टूबर तक मनाया जाएगा। कोरोनाकाल के दो वर्ष बाद इस महोत्सव को काफी भव्य तरीके से मनाया जा रहा है। नैनीताल में सबसे पहले इसकी शुरुआत वर्ष 1956 में हुई थी। …

नैनीताल, अमृत विचार। सरोवर नगरी में सर्ब जनिन दुर्गा पूजा कमेटी के तत्वावधान में इस बार 66वां दुर्गा पूजा महोत्सव एक अक्टूबर से पांच अक्टूबर तक मनाया जाएगा। कोरोनाकाल के दो वर्ष बाद इस महोत्सव को काफी भव्य तरीके से मनाया जा रहा है। नैनीताल में सबसे पहले इसकी शुरुआत वर्ष 1956 में हुई थी।

बंगाल के टेलीफोन एक्सचेंज में अधिकारी देव नाथ ने यह शुरुआत की। बाद में बंगाल मूल के यहां कार्यरत कर्मचारियों और अधिकारियों ने इस महोत्सव को बढ़ावा दिया। खास बात यह है कि यह महोत्सव अब केवल बंगाल समुदाय का नहीं रह गया, इसमें अन्य समुदाय के लोग भी बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

हर वर्ष नैनीताल में सर्ब जनिन दुर्गापूजा कमेटी इसका आयोजन करती है। समिति के अध्यक्ष चंदन कुमार दास हैं। वे नैनीताल में वर्ष 1988 से रह रहे हैं। वर्तमान में वे पशुपालन विभाग में टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 1956-58 तक चीना बाबा मंदिर के पास स्थित शांति कुंज धर्मशाला में घट स्थापना के साथ सबसे पहले दुर्गा पूजा की शुरुआत की गई थी।

वर्ष 1959 में सबसे पहले मां दुर्गा की मूर्ति का निर्माण किया गया। बताया कि पहले लखनऊ और बरेली से ट्रेन और उसके बाद ट्रक के माध्यम से नैनीताल में मां दुर्गा की मूर्ति लाई जाती थी, लेकिन वर्ष 1963 से नैनीताल में ही मूर्ति का निर्माण किया जाने लगा। बताया कि वर्तमान में यहां 25 से 30 बंगाली परिवार निवास कर रहे हैं, लेकिन इस उत्सव में सभी धर्मों के लोगों का सहयोग मिलता है।

सात समुद्र, श्मशान घाट की मिट्टी से करते हैं मूर्ति निर्माण
चंदन कुमार दास का कहना है कि मूर्ति निर्माण के लिए बंगाल से कलाकार बुलाये जाते हैं। इस बार 24 परगना विराटी के कलाकारों ने मूर्ति बनाई है। मूर्ति निर्माण की खासियत है कि इसके लिए सप्त समुद्र, गंगा नदी और श्मशान घाट की मिट्टी लाई जाती है। चिकनी, दोमट, बलुई इन मिट्टी के प्रकार, धान की पुआल, चावल, दूब की सुतली, बांस के खप्चों और खड़िया मिट्टी से मूर्ति तैयार की जाती है। उसके बाद उसमें केमिकल फ्री कलर किए जाते हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान न हो।