रामपुर: सद्भावना की मिसाल पेश कर रहा मुस्लिम परिवार, पीढ़ी-दर पीढ़ी बनाते चला आ रहा है रावण का पुतला

रामपुर, अमृत विचार। रामपुर में ऐतिहासिक विजयादशमी मेले में रावण के पुतले के निर्माण में मंजूर खां का कुनबा जुट गया है। इनकी तीन पीढ़ियां इस कार्य में लगी रही हैं। इस परिवार के लोग रावण के पुतले के अलावा लंका आदि सहित अन्य पुतले बनाते हैं। इस साल 75 फीट ऊंचे रावण का पुतला मेले में आकर्षण का केंद्र होगा। पिछले वर्ष तो कोरोना संक्रमण काल की वजह से रामलीलाएं नहीं हुईं जिसकारण इस परिवार पर संकट गहराया रहा। तो इस बार कुछ उम्मीद जगी है। पूरा परिवार सद्भावना की मिसाल पेश कर रहा है।

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रामपुर शहर में आजादी से पूर्व ही रामलीला का मंचन शुरू हो गया था। इसके बाद से ही मंजूर खां के बुजुर्ग रावण के पुतला बनाने लगे। पहले रावण, फिर मेघनाद और फिर कुंभकरण के भी पुतले बनने शुरू हुए। बाद में सोने की लंका भी बनने लगी। धीरे धीरे पूरे जिले के रामलीला मेले में रावण के पुतले बनाने के लिए आर्डर मिलने लगे। पीढ़ी दर पीढ़ी यह काम चलता रहा कभी दिक्कत नहीं आई। लेकिन कोरोना काल में रामलीलाएं नहीं होने से संकट पैदा कर दिया था। इस बार सही आर्डर आए हैं।

पूरा परिवार पुतले बनाने में जुटा हुआ है। मंजूर खां कहते हैं कि हिंदू धर्म के लोग हम से ही पुतला बनवाने आते हैं। हमें इसका बहुत गर्व है। हम भी पूरे मन और लगन से पुतले बनाकर देते हैं। मंजूर खां सद्भाव की मिसाल हैं। उन्हें पुतला बनाते बनाते पूरी रामयण की कहानी याद हो गई है। सबको सुना देते हैं। राम के चरित्र को भी बता देते हैं। रावण के कारनामे भी गिना देते हैं और कहते हैं कि अहंकार ने रावण के प्राण ले लिए। आजकल अहंकार किसी को नहीं करना चाहिए। राम जैसे चरित्र बनकर रहना चाहिए।

कोरोना में आया था संकट
शहर के रहने वाले मंजूर खान ने बताया कि पिछले साल लाकडाउन होने के कारण रावण का आर्डर नहीं मिल सका था। इस बार सोचा था कि बड़े रावण बनाने की परमीशन मिलेगी, लेकिन नहीं मिल सकी। छोटे-छोटे पुतले बनाकर काम चलाया जा रहा है। पिछले 2 महीने से किराए का गोदाम लेकर लेने के बाद लेबर लगाकर काम कर रहे हैं। पूरा परिवार जुटा है।

35 से 40 फुट के पुतले बनाए
हर साल रावण दहन के दौरान उसके पुतले 60 से लेकर 75 फुट लंबे बनाने के आर्डर मिलते थे। लेकिन इस बार 35 से लेकर 40 फिट के पुतले बनाए है बड़े पुतले लोग लेने से इस बार इंकार का रहे हैं। इन दिनों में करीब 50 पुतले बिक जाते थे लेकिन इस बार 10-12 ही बनाए हैं इन कामों में अब रिस्क ज्यादा हो गया है। खर्चा तक नहीं निकल पाता, इस काम को पीढ़ी दर पीढ़ी कर रही है।

अब दशहरे पर ज्यादा काम नहीं मिल रहा, तो सरकार को आर्थिक रुप से हमारी सहायता करनी चाहिए। ताकि हमारे परिवार का गुजारा हो सके।कुछ रामलीलाओं की परमिशन न मिलने से ऑर्डर कैंसिल हो गए।इस काम में चार मेरे लड़के तीन लड़कियां के अलावा लेबर लगती है। रिक्शा की लेबर अलग है जो पुतलों को लेकर जाती है अब इस काम में बस मेहनत मजदूरी पड़ रही है। शहर को छोड़कर कहीं के पुतले 75 फिट के नहीं होते हैं।

क्या कहते हैं बुजुर्ग अब और पिछले दौर के बारे में
मंजूर खां कहते हैं मेले में बैलगाड़ी और ट्रैक्टर से महिलाओं के पहुंचने की एक अनोखी परंपरा रही है। हालांकि बदले दौर में अब बैलगाड़ी ही नहीं दिखाई पड़ती हैं। इनकी गाड़ियों ने ले ली है। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग मेले में पहुंचते हैं। मेला स्थल पर व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस प्रशासन के साथ ही रामलीला समिति के पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। आयोजन स्थल में बने पंडाल में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अफसरों की मौजूदगी मेले के महत्व को दर्शाती है।

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