नैनीताल: पहाड़ी अंचलों में तिमल के पत्तों को श्राद्ध में क्यों माना जाता है महत्वपूर्ण…

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नैनीताल, अमृत विचार। पितृ श्राद्ध के दौरान तिमल वृक्ष के पत्तों की खासी मांग रहती है। वैसे तो राज्य में ऐसे कई पेड़ पौधे हैं जो औषधीय गुणों के साथ ही धार्मिक महत्त्व से भी जुड़े हैं लेकिन तिमिल का पेड़ अपने आप में खास है, जो राज्य के पहाड़ी इलाकों और ग्रीष्म जलवायु वाले क्षेत्रों में अत्यधिक पाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्राद्ध में तिमिल की पत्तियों को ही क्यों प्रयोग किया जाता है चलिए आपको भी इसके बारे में बताते हैं।

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तिमल का वानस्पतिक नाम फाइकस ऑरीक्यूलेटा है। आम भाषा में तिमल कहे जाने वाला ये पेड़ 800 से 2200 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता है। इसकी पत्तियां 20 से 25 सेंटीमीटर तक चौड़ी होती हैं। तिमल का पेड़ एक एक पादप है जिसका प्रत्येक हिस्सा इस्तेमाल किया जाता है इस पेड़ की पत्तियों को गाय भैंसों के चारे के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

इसके पत्तों को खाकर दुधारू जानवरों का दूध भी बढ़ जाता है। वहीं इसके फल को खाने के रूप में भी इस्तेमाल में लाया जाता है। शुरुआत में जब इसके फल कच्चे होते हैं तब पहाड़ों में इसकी सब्जी बनाकर खाई जाती है। हल्के लाल और पीले हो जाने पर इसका स्वाद काफी अच्छा होता है। इसके फल ज्यादा पकने पर काले भी हो जाते हैं जो इसमें कीड़ा लगने की निशानी है।

तिमले के तेल में कैंसर रोधी क्षमता वाला वैसीसिनिक एसिड भी पाया जाता है। दिल की विभिन्न बीमारियों के इलाज में कारगर लाइनोलेनिक एसिड भी इस फल में पाया गया है। यह दिल की धमनियों के ब्लॉकेज हटाने में सहायक होता है। इसके अलावा इसमें पाया जाने वाला ऑलिक एसिड लो-डेंसिटी लाइपोप्रोटीन की मात्रा शरीर में कम करता है, इस प्रोटीन से कोलेस्ट्रोल का स्तर बढ़ता है। कीड़े भी इसके पत्तों को काफी पसंद करते हैं।

तिमल का रायता भी पहाड़ों में लोक प्रिय बेहद लोकप्रिय है। नेपाल में इस पेड़ की छाल का जूस बनाया जाता है जो अपने आप में एक औषधि है साथ ही यह डाइरिया, चोट, घाव के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है। वहीं इसके पत्तियों का जूस पीने से गैस्ट्रिक प्रॉब्लम से जल्द छुटकारा मिलता है।

वहीं तिमल के धार्मिक महत्व की बात करें तो इसकी पत्तियां इस दृष्टिकोण से बहुत ही पवित्र मानी जाती हैं जिसके चलते पितृ श्राद्ध पर तर्पण के दौरान इन्हीं से बने पत्तल में पितरों को भोग लगाया जाता है। पहाड़ों में लंबे समय तक तिमला के साफ पत्तों से पत्तल बनायी जाती थी। हालांकि अब शादी या अन्य किसी कार्य में ‘माल़ू’ के पत्तों से बने पत्तलों या फिर से प्लास्टिक थर्माकोल से बने पत्तलों का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन एक समय था जब पत्तल सिर्फ तिमला के पत्तों के बनाये जाते थे। इसके पत्तों को शुद्ध माना जाता है और इसलिए किसी भी तरह के धार्मिक कार्य में इनका उपयोग किया जाता है। अब भी धार्मिक कार्यों से जुड़े कई ब्राह्मण कम से कम पूजा में तिमला के पत्तों और उनसे बनी ‘पुड़की’ का उपयोग करना पसंद करते हैं।

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