बढ़ेगी महंगाई

देश में दो महीने त्योहारों के हैं। पहले से ही महंगाई से त्रस्त लोगों पर अब फिर से महंगाई का चाबुक पड़ने वाला है। सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़ कर 7.41 फीसद पर पहुंच गई है। यह पिछले पांच महीने में सबसे ज्यादा है। इससे रिजर्व बैंक की परेशानी और बढ़ेगी। चिंता की बात …
देश में दो महीने त्योहारों के हैं। पहले से ही महंगाई से त्रस्त लोगों पर अब फिर से महंगाई का चाबुक पड़ने वाला है। सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़ कर 7.41 फीसद पर पहुंच गई है। यह पिछले पांच महीने में सबसे ज्यादा है। इससे रिजर्व बैंक की परेशानी और बढ़ेगी। चिंता की बात है कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई दर लगातार बढ़ने से आम लोगों के रोजमर्रा की जिंदगी पर बुरा असर पड़ रहा है।
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विश्व व्यापार संगठन का कहना है कि पूरी दुनिया में महंगाई की मार अगले दो सालों तक बनी रहेगी। मंदी का दौर अगले चार सालों तक चलेगा। खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ने का मतलब यही है कि बाजार में चीजों के दाम फिर बढ़ जाएंगे। रुपए की कीमत गिरने से भी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। डॉलर के मुकाबले रुपए में हो रही रिकॉर्ड गिरावट के बाद सरकार पर विपक्ष हमला कर रहा है। जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कह रही हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद अच्छी है, व्यापक आर्थिक बुनियाद भी अच्छी है। विदेशी मुद्रा भंडार अच्छा है।
दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में भारत में मुद्रास्फीति कम है और मौजूदा स्तर पर उससे निपटा जा सकता है। कमजोरी रुपये में नहीं आई बल्कि डॉलर में मजबूती आई है। शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 82.35 के भाव पर बंद हुआ था। रिजर्व बैंक ने 2026 तक खुदरा मुद्रास्फीति को चार प्रतिशत रखने का लक्ष्य रखा था और इसमें दो प्रतिशत की गुंजाइश और जोड़ी गई थी, यानी हद से हद खुदरा मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत रहे। लेकिन अगस्त में यह 7 प्रतिशत तक रही और अब उससे भी .41 प्रतिशत अधिक होकर 7.41 हो गई है।
इसका असर अब विकास दर पर भी पड़ेगा। आईएमएफ ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जाहिर की है। दुनिया में अब मंदी की आहट फिर सुनाई दे रही है। खाद्य एवं कृषि संगठन के ताजा आंकड़ों के अनुसार दुनिया में इस साल अनाज की कीमतें 13.8 प्रतिशत बढ़ गई हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने पिछले दिनों 2022 में भारत के आर्थिक विकास के अपने अनुमान को घटाकर 6.8 प्रतिशत कर दिया है।
यूक्रेन युद्ध की वजह से दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता बढ़ गई है, ऐसे में आरबीआई के लिए महंगाई कम रखते हुए अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार की बुनियाद पक्की करना आसान नहीं है। साथ ही औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि नहीं होने का बुरा असर भी जीडीपी पर पड़ेगा। खाद्य पदार्थों की कीमतों में संतुलन लाना भी चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।
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