मुरादाबाद : स्थानीय मुद्दे बेकार, बड़े नेताओं के भरोसे कराएंगे नैया पार

विनोद श्रीवास्तव/अमृत विचार। विधानसभा चुनाव में अधिकतर सूरमा जीत के लिए खुद के सहारे नहीं, बल्कि पार्टी के बड़े नेताओं के भरोसे हैं। वह खुद की छवि पर नहीं, बल्कि बड़े नेताओं के नाम पर जीत का दम भर रहे हैं। जनता के बीच भी दिग्गज नेताओं का ही क्रेज है। कई मतदाता तो दलों …
विनोद श्रीवास्तव/अमृत विचार। विधानसभा चुनाव में अधिकतर सूरमा जीत के लिए खुद के सहारे नहीं, बल्कि पार्टी के बड़े नेताओं के भरोसे हैं। वह खुद की छवि पर नहीं, बल्कि बड़े नेताओं के नाम पर जीत का दम भर रहे हैं। जनता के बीच भी दिग्गज नेताओं का ही क्रेज है। कई मतदाता तो दलों के प्रत्याशियों के नाम व चेहरे से ही अनजान हैं।
2022 का चुनावी समर इस बार पिछली कई दफा से अलग है। इस चुनाव में कोई एक दल नहीं, कमोवेश हर दल के प्रत्याशी खुद के भरोसे नहीं अपितु पार्टी के दिग्गज चेहरों के नाम पर नैया पार लगने की आस में हैं। जनता के सिर पर भी प्रत्याशी नहीं, बल्कि इन दिग्गजों की खुमारी चढ़ी है। भाजपा में मोदी-योगी के नाम का डंका बज रहा है तो सपा के प्रत्याशी अखिलेश के नाम की माला जप कर खुद के सिरमौर बनने के लिए मार्च की 10 तारीख पर टकटकी लगाए हैं।
बसपा के हाथी की चाल माया के मोहपाश पर निर्भर है तो कांग्रेस को प्रियंका और राहुल से आस है। हालांकि दलों ने स्टार प्रचारकों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त पेश की है। लेकिन, इसमें सबसे प्रमुख दल के मुख्य मुखिया ही हैं, जिनके इर्द-गिर्द पार्टी ही नहीं जनता का भी पूरा फोकस है। कहीं योगी ही आएंगे तो कहीं 22 में बाइसिकिल की धूम है। लड़की हूं लड़ सकती हूं का नारा देकर प्रियंका गांधी चुनावी समर में कांग्रेस की नैया पार लगाने को पूरा दम दिखा रही हैं तो बसपा के हाथी की चिंघाड़ माया के दम पर निर्भर है।
दलों के दिग्गजों के आभामंडल में प्रत्याशियों का रंग फीका पड़ता दिख रहा है। क्योंकि सोशल मीडिया और चुनावी चर्चाओं में दिग्गजों का ही महिमा मंडन किया जा रहा है। स्थानीय मुद्दे भी इस चुनावी शोर में गुम से हो गए हैं। कई मतदाता तो ऐसे हैं, जिन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र से लड़ने वाले प्रत्याशी का नाम व चेहरा तक पता नहीं है। वह तो किसी और को अपने ख्याल और सोच में रचाए बसाए बैठे हैं। उस छवि पर ही उनके वोट का दारोमदार रहेगा। हालांकि प्रत्याशी एक दूसरे पर शब्दों के तीर तो चला रहे हैं। लेकिन, उन्हें न जाम के झाम को हटाने की चिंता है, न ही शिक्षा-चिकित्सा और यातायात को सुचारू बनाने की फिक्र।
इन प्रमुख मुद्दों से नेताओं ने किया किनारा
सरकारी मेडिकल कॉलेज
38 लाख की आबादी वाली विश्व प्रसिद्ध पीतल नगरी के नागरिकों के स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए यहां सरकारी मेडिकल कॉलेज की सख्त दरकार है। इसके न होने से जिले ही नहीं आसपास के कई और जिलों के गंभीर मरीजों को मेरठ, लखनऊ और दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ती है। मुरादाबाद में केवल पड़ोसी जिले ही नहीं, उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले ऊधमसिंह नगर, नैनीताल आदि जिलों के मरीज भी इलाज के लिए आते हैं। ऐसे में सरकारी मेडिकल कॉलेज की टीस लोगों को लगातार साल रही है।
सोनकपुर ओवरब्रिज व गोविंदनगर फुटओवर ब्रिज
कांठ रोड को दिल्ली रोड से जोड़ने वाले अति महत्वपूर्ण सोनकपुर उपरिगामी सेतु (ओवरब्रिज) का निर्माण कई साल से अधर में लटका है। 116 करोड़ रुपय की लागत से बन रहे 1.15 किलोमीटर लंबे सोनकपुर उपरिगामी सेतु के निर्माण कार्य का शिलान्यास 2017 में तत्कालीन रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने किया था। दिसंबर 2019 में इसे बनकर तैयार होना था। इस पुल का निर्माण उत्तर प्रदेश सेतु निगम और रेलवे द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है। इस पुल के बन जाने से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी कम होने से समय व धन दोनों की बचत होगी। मगर यह अधर में लटका हुआ है। गोविंदनगर फुटओवर ब्रिज, जो लगभग बनकर तैयार है। लेकिन, राजनीतिक रार के चलते इसका उद्घाटन नहीं हो पा रहा है। जनहित के ऐसे बड़े प्रोजेक्ट की अनदेखी की चर्चा चुनावी सभाओं में भले हो। लेकिन, वे मुद्दा बनकर ही रह जाते हैं।
विश्वविद्यालय
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण जिला होने के बाद भी यहां उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय नहीं है। यहां के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए बरेली, लखनऊ और दिल्ली का सफर करना पड़ता है। दूर जाकर पढ़ाई करने में छात्र-छात्राओं में असुरक्षा की भावना तो रहती है, परिवार पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।
एसईजेड विकसित न होने से पीतल कारोबारियों में निराशा
पीतल नगरी के नाम से विश्व प्रसिद्ध मुरादाबाद में ब्रास और स्टील का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है। यहां की कई औद्योगिक इकाइयों से निकले उत्पादों की डिमांड यूएस, अमेरिका, लंदन, फ्रांस, पेरिस आदि देशों में अधिक है। मुरादाबाद हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के सचिव अवधेश अग्रवाल का कहना है कि यहां के उत्पादों का निर्यात विदेशों में भी होता है। यहां ब्रास कारोबार के लिए एसईजेड (विशेष आर्थिक जोन) का विकसित होना जरूरी है। इससे ही पीतल कारोबार को और समृद्ध किया जा सकेगा। इसके लिए राजनेताओं को आगे आना होगा।
अतिक्रमण व पार्किंग का नासूर सुगम यातायात में रोड़ा
शहर में यातायात के सुगम होने में अतिक्रमण और पार्किंग का इंतजाम न होना नासूर बना हुआ है। शहर की बाहरी और भीतरी सड़कों पर अतिक्रमण का दंश स्मार्ट सिटी में सुचारू यातायात में रोड़ा बनता है। स्मार्ट सिटी मिशन के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में इसे शामिल तो किया गया है। लेकिन, सुगम यातायात का इंतजार अभी भी किसी हसीन ख्वाब के समान है। इस विषय में नेताओं को गंभीर होना होगा, जिससे महानगर विकास के पथ पर आगे बढ़ सके।