हितों की सर्वोच्चता

उज्बेकिस्तान की राजधानी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए बयान की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है।

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शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सदस्य देशों के प्रमुखों के शिखर सम्मलेन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व रूस के राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात ऐसे समय में हुई जब अमेरिका और रूस के बीच तनाव चरम पर हैं। उज्बेकिस्तान की राजधानी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए बयान की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है।

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शनिवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह वक्त युद्ध का नहीं है। इस बयान के कुछ ही घंटे बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उस प्रस्ताव पर रूस के खिलाफ मतदान किया जिसमें यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की को अगले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने की इजाजत की बात थी। इन दोनों ही घटनाओं को भारत के अब तक रूस को लेकर रहे रुख में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

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मोदी ने पुतिन से जो बात कही, वह भारत का बदला हुआ रुख नहीं है। जानकारों का मानना है कि रूस से जो कहा जाना चाहिए, वह भारत ने आखिरकार कह ही दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ में हाल में भारत का जो रुख रहा है, उससे भी इस विश्लेषण को आधार मिलता है। संयुक्त राष्ट्र की बैठकों को संबोधित करने को लेकर भारत ने दो बार यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के हक में वोट डाले। लेकिन क्या जानकारों का यह मत सही है? यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से ही मोदी संघर्ष रोकने की अपील कर रहे हैं। प्रधानमंत्री यह कहते आए हैं कि इस भू-राजनीतिक संकट में हम वही करेंगे, जो राष्ट्रहित में होगा। यही वजह है कि भारत ने शांति और बातचीत की वकालत तो की लेकिन वह पश्चिमी देशों के रूस पर लगाए आर्थिक प्रतिबंधों से दूर रहा।

यह सही फैसला था क्योंकि यूरोप ने भी रूस से तेल और गैस खरीदना बंद नहीं किया और इसे आर्थिक प्रतिबंधों से अलग रखा। इससे पहले मोदी और पुतिन की मुलाकात नौ महीने पूर्व हुई थी। दिसंबर, 2021 में राष्ट्रपति पुतिन ने कुछ घंटे के लिए नई दिल्ली की यात्रा की थी और उनकी पीएम मोदी के साथ बैठक हुई थी। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पीएम मोदी की पुतिन के साथ कई बार टेलीफोन पर वार्ता हुई है, लेकिन यह हाल के दिनों की इनके बीच पहली द्विपक्षीय बैठक थी। हाल ही में हुई पुतिन और मोदी की मुलाकात ने द्विपक्षीय रिश्तों की करीबी को रेखांकित किया। भारत के नजरिए से तो सबसे बड़ी बात यही है कि उसने न सिर्फ एससीओ में अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज की बल्कि रूसी राष्ट्रपति के साथ करीबी बढ़ाने का संकेत देकर अपनी स्वतंत्रता और व्यावसायिक हितों की सर्वोच्चता बरकरार रखी।

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