खेल दिवस विशेष: …और हॉकी से दूर भागने वाले मेजर ध्यान चंद बन गए ‘हॉकी के जादूगर’

खेल दिवस विशेष: …और हॉकी से दूर भागने वाले मेजर ध्यान चंद बन गए ‘हॉकी के जादूगर’

राजपूतों के गौरव, विश्व के महानतम खिलाड़ी, हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान सिंह (इलाहबाद के बैस राजपूत) की जयंती 29 अगस्त को खेल दिवस के रूप में मनाई जाती है। मुग़ल काल से लेकर सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अनेकों राजपूत शूरवीरों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर हिन्दुस्तान का गौरव बढ़ाया है। खेल …

राजपूतों के गौरव, विश्व के महानतम खिलाड़ी, हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान सिंह (इलाहबाद के बैस राजपूत) की जयंती 29 अगस्त को खेल दिवस के रूप में मनाई जाती है। मुग़ल काल से लेकर सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अनेकों राजपूत शूरवीरों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर हिन्दुस्तान का गौरव बढ़ाया है। खेल के क्षेत्र में भी हमारे समाज के कई महान विभूतियों ने राजपूत समाज के साथ साथ अपने देश का नाम भी गौर्वानित किया है जिसमें एक नाम स्वर्गीय मेजर धयान सिंह या ध्यान चंद का भी शामिल है।

अगर भारत में क्रिकेट का नाम आते ही दिमाग में सचिन तेंदुलकर की छवि बनती है तो यहां हॉकी का दूसरा नाम मेजर ध्यान चंद है। अगर क्रिकेट में लोग सर डॉन ब्रेडमैन को सबसे महान खिलाड़ी मानते हैं और टेनिस में रॉडलेवर जैसा कोई नहीं हुआ तो हॉकी में भी इस भारतीय का कुछ ऐसा ही स्थान मेजर ध्यान चंद को हासिल हुआ।

उनको हॉकी के जादूगर नाम से भी जाना जाता है। वे भारत के महान खिलाड़ी और विश्व के सबसे अच्छे हॉकी के खिलाड़ी कहे जाते हैं। वैसे भी हॉकी भारतीयों का मुख्य खेल भी है। वे तीन बार ओलम्पिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हैं जिनमें 1926 का एम्सटर्डम ओलोम्पिक, 1932 का लॉस एंजेल्स ओलोम्पिक एवं 1937 का बर्लिन ओलम्पिक शामिल है। उनकी जन्म तिथि (29 अगस्त) को भारत में “राष्ट्रीय खेल दिवस” के तौर पर मनाया जाता है |

मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त सन् 1905 ई. को प्रयाग (इलाहाबाद) में बैस राजपूत परिवार में हुआ था। इनके पिता सोमेश्वर दत्त सिंह उन दिनों ब्रिटिश इंडियन सेना में सूबेदार थे जो हॉकी के खिलाड़ी थे। मेजर ध्यान सिंह के दो भाई मूल सिंह व रूप सिंह थे। उनके बाल्य-जीवन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी।

मेजर ध्यान चंद साधारण शिक्षा ही प्राप्त कर पाए थे क्योंकि इनका परिवार एक स्थान से दूसरे स्थान पर पिता की पोस्टिंग के साथ स्थान्तरित होता रहा। बाद में ये झाँसी में स्थाई रूप से बस गये थे। 16 वर्ष की अवस्था में 1922 ई. में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भर्ती हो गए। जब ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट’ में भर्ती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रूचि नहीं थी। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर भोले तिवारी को है।

मेजर तिवारी स्वंय भी हॉकी के प्रेमी और खिलाड़ी थे। मेजर भोले तिवारी ने उनको हॉकी खेल के कुछ गुरु भी सिखाये। उनकी ही देखरेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे और देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए। पंकज गुप्ता उनके हॉकी के प्रथम कोच थे। उन्होंने ये घोषणा की थी कि एक दिन ध्यान सिंह मून की तरह चमकेगा, मून को हिंदी में चंद कहते है। इसलिए बाद
में ध्यान सिंह से ध्यान चंद कहलाने लगे।

सन् 1927 ई. में लांस नायक बना दिए गए। सन् 1932 ई. में लॉस ऐंजल्स जाने पर नायक नियुक्त हुए। सन् 1937 ई. में जब भारतीय हॉकी दल के कप्तान थे तो उन्हें सूबेदार बना दिया गया। जब द्वितीय महायुद्ध प्रारंभ हुआ तो सन् 1943 ई. में ‘लेफ्टिनेंट’ नियुक्त हुए और भारत के स्वतंत्र होने पर सन् 1948 ई. में कप्तान बना दिए गए। केवल हॉकी के खेल के कारण ही सेना में उनकी पदोन्नति होती गई।

1938 में उन्हें ‘वायसराय का कमीशन’ मिला और वे सूबेदार बन गए। उसके बाद एक के बाद एक दूसरे सूबेदार, लेफ्टीनेंट और कैप्टन बनते चले गए। बाद में उन्हें मेजर बना दिया गया। हॉकी के इस महान खिलाड़ी ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समतुल्य माना जाता है। गेंद इस कदर उनकी स्टिक से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहाँ तक हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई।

जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई। ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों। उनकी हॉकी की कलाकारी देखकर हॉकी के मुरीद तो वाह-वाह कह ही उठते थे बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुधबुध खोकर उनकी कलाकारी को देखने में मशगूल हो जाते थे।

उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे तानाशाह ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने के लिए खेलने का आग्रह तक कर डाला और जर्मन सेना मेंफील्ड मार्शल बनाने तक की पेशकश कर डाली। लेकिन ध्यानचंद ने विनम्रता से हिटलर का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया और उन्होंने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा।

वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई और दिखाया कि ध्यानचंद कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे। सन् 1922 ई. से सन् 1926 ई. तक सेना की ही प्रतियोगिताओं में हॉकी खेला करते थे। दिल्ली में हुई वार्षिक प्रतियोगिता में जब इन्हें सराहा गया तो इनका हौसला बढ़ा। 13 मई सन् 1926 ई. को न्यूजीलैंड में पहला मैच खेला था। न्यूजीलैंड में 21 मैच खेले जिनमें 3 टेस्ट मैच भी थे।

इन 21 मैचों में से 18 जीते, 2 मैच अनिर्णीत रहे और और एक में हारे। पूरे मैचों में इन्होंने 192 गोल बनाए। उन पर कुल 24 गोल ही हुए। 27 मई सन् 1932 ई. को श्रीलंका में दो मैच खेले। एक मैच में 21-0 तथा दूसरे में 10-0 से विजयी रहे। सन् 1935 ई. में भारतीय हॉकी दल के न्यूजीलैंड के दौरे पर इनके दल ने 49 मैच खेले। जिसमें 48 मैच जीते और एक वर्षा होने के कारण स्थगित हो गया। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए।

अप्रैल, 1949 ई. को प्रथम कोटि की हाकी से संन्यास ले लिया। 1928 में एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में पहली बार भारतीय टीम ने भाग लिया। एम्स्टर्डम में खेलने से पहले भारतीय टीम ने इंग्लैंड में 11 मैच खेले और वहाँ ध्यानचंद को विशेष सफलता प्राप्त हुई। एम्स्टर्डम में भारतीय टीम पहले सभी मुकाबले जीत गई। 17 मई सन् 1928 ई. को आस्ट्रिया को 6-0, 18 मई को बेल्जियम को 9-0, 20 मई को डेनमार्क को 5-0, 22 मई को स्विट्जरलैंड को 6-0 तथा 26 मई को फाइनल मैच में हालैंड को 3-0 से हराकर विश्व भर में हॉकी के चैंपियन घोषित किए गए और 29 मई को उन्हें पदक प्रदान किया गया। फाइनल में दो गोल ध्यानचंद ने किए।

1932 में लास एंजिल्स में हुई ओलम्पिक प्रतियोगिताओं में भी ध्यानचंद को टीम में शामिल कर लिया गया। उस समय सेंटर फॉरवर्ड के रूप में काफी सफलता और शोहरत प्राप्त कर चुके थे। तब सेना में वह ‘लैंस-नायक’ के बाद नायक हो गये थे। इस दौरे के दौरान भारत ने काफी मैच खेले। इस सारी यात्रा में ध्यानचंद ने 262 में से 101 गोल स्वयं किए। निर्णायक मैच में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। तब एक अमेरिका समाचार पत्र ने लिखा था कि भारतीय हॉकी टीम तो पूर्व से आया तूफान थी। उसने अपने वेग से अमेरिकी टीम के ग्यारह खिलाड़ियों को कुचल दिया।

सन् 1936 में विवाह जानकी देवी के साथ हुआ इसी समय 1936 के बर्लिन ओलपिक खेलों में ध्यानचंद को भारतीय टीम का कप्तान चुना गया। इस पर उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- “मुझे ज़रा भी आशा नहीं थी कि मैं कप्तान चुना जाऊँगा” खैर, उन्होंने अपने इस दायित्व को बड़ी ईमानदारी के साथ निभाया।

अपने जीवन का अविस्मरणीय संस्मरण सुनाते हुए वह कहते हैं कि 17 जुलाई के दिन जर्मन टीम के साथ हमारे अभ्यास के लिए एक प्रदर्शनी मैच का आयोजन हुआ। यह मैच बर्लिन में खेला गया। हम इसमें चार के बदले एक गोल से हार गए। इस हार से मुझे जो धक्का लगा उसे मैं अपने जीते-जी नहीं भुला सकता। जर्मनी की टीम की प्रगति देखकर हम सब आश्चर्यचकित रह गए और हमारे कुछ साथियों को तो भोजन भी अच्छा नहीं लगा। बहुत-से साथियों को तो रात नींद नहीं आई।

5 अगस्त के दिन भारत का हंगरी के साथ ओलम्पिक का पहला मुकाबला हुआ, जिसमें भारतीय टीम ने हंगरी को चार गोलों से हरा दिया। दूसरे मैच में, जो कि 7 अगस्त को खेला गया, भारतीय टीम ने जापान को 9-0 से हराया और उसके बाद 12 अगस्त को फ्रांस को 10 गोलों से हराया। 15 अगस्त के दिन भारत और जर्मन की टीमों के बीच फाइनल मुकाबला था। यद्यपि यह मुकाबला 14 अगस्त को खेला जाने वाला था पर उस दिन इतनी बारिश हुई कि मैदान में पानी भर गया और खेल को एक दिन के लिए स्थगित कर दिया गया।

अभ्यास के दौरान जर्मनी की टीम ने भारत को हराया था, यह बात सभी के मन में बुरी तरह घर कर गई थी। फिर गीले मैदान और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हमारे खिलाड़ी और भी निराश हो गए थे। तभी भारतीय टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता को एक युक्ति सूझी। वह खिलाड़ियों को ड्रेसिंग रूम में ले गए और सहसा उन्होंने तिरंगा झण्डा हमारे सामने रखा और कहा कि इसकी लाज अब तुम्हारे हाथ है। सभी खिलाड़ियों ने श्रद्धापूर्वक तिरंगे को सलाम किया और वीर सैनिक की तरह मैदान में उतर पड़े। भारतीय खिलाड़ी जमकर खेले और जर्मन की टीम को 8-1 से हरा दिया। उस दिन सचमुच तिरंगे की लाज रह गई। उस समय कौन जानता था कि 15 अगस्त को ही भारत का स्वतन्त्रता दिवस बनेगा।

ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना क़ायल बना दिया था। यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंतर पर पड़ता है। दुनिया ने 27 अगस्त को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाई तो 29 अगस्त को वह ध्यानचंद को नमन करने के लिए तैयार है, जिसे भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

ब्रैडमैन हॉकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे। अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से मिले थे। वह 1935 की बात है जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी। तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और ध्यानचंद दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह से गोल करते हैं, जैसे क्रिकेट में रन बनते हैं।

यही नहीं ब्रैडमैन को बाद में जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का क़ायल बना दिया था। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर भी एक ही नाम छाया था और वह था ध्यानचंद।

उन्हें 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। ध्यानचंद को खेल के क्षेत्र में 1956 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। उनके जन्मदिन (29 अगस्त) को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।

भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था। फिलहाल भारत के रत्नरूपी ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग भी की जा रही है। भारत रत्न को लेकर ध्यानचंद के नाम पर अब भी विवाद जारी है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारे क्षत्रिय/राजपूती संगठनों ने कभी इस विषय में अपना ध्यान ही नहीं आकर्षित किया और शायद इस तरह की कोई मंच के माध्यमों से माँग भी नहीं की। शायद हमारी युवा पीढ़ी तो कम ही उनके विषय में जानती होगी। मैं इस लेख के माध्यम से युवाओं से आग्रह करता हूँ कि वे मेजर ध्यानचंद के जीवन परिचय को पढ़ कर खेल के क्षेत्र में भी प्रेरणा लें।

  • विवेक श्रीवास्तव