लाभकारी मूल्य

बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने संबंधी विधेयक को मंजूरी दे दी। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान इन कानूनों को निरस्त करने से संबंधित विधेयक पेश किए जाने के लिए सूचीबद्ध है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर को तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की अप्रत्याशित रूप से घोषणा की थी। जिस पर सरकार व किसान समर्थक अपनी-अपनी जीत का राग अलाप रहे हैं। बहरहाल सरकार के इस निर्णय से हार-जीत से ऊपर उठकर विचार किया जाना चाहिए कि देश के किसानों की दशा में कैसे सुधार हो।

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आंकड़ों के अनुसार किसान व साधारण वेतनभोगी की आय में दस गुना से ज्यादा का अंतर है। इस असमानता को दूर करने के ईमानदार प्रयास किए जाने चाहिए। वर्ष 2013 के बाद से सरकार ने किसानों की वास्तविक आय के सर्वे कराने बंद कर दिए हैं। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वायदा किया गया, परंतु जमीन पर ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं दे रहा है। प्रधानमंत्री ने जीरो बजट खेती यानि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए, एमएसपी को और अधिक प्रभावी बनाने पर निर्णय लेने के लिए कमेटी बनाने की भी घोषणा की थी।

जानकारों के अनुसार जैविक खेती अथवा शून्य बजट खेती जैसे विचार सैद्धांतिक तौर पर सतत कृषि के लिए अनुकूल हो सकते हैं लेकिन व्यापक तौर पर उन्हें अपनाना शायद सही विकल्प न हो। इनकी मदद से कृषि उपज की व्यापक और तेजी से बढ़ती मांग को पूरा नहीं किया जा सकता। ऐसे में जरूरत यह है कि कृषि गतिविधियों की कुल उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास किया जाए।

इस बीच, किसान संघों के संगठन एसकेएम ने फसलों के लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी समेत सरकार के समक्ष रखी गई अपनी छह मांगें दोहराते हुए सोमवार को कहा था कि जब तक ये मांगें पूरी नहीं हो जातीं तब तक वह आंदोलन जारी रखेगा। किसान संगठनों का कहना है कि एमएसपी पर लीगल गारंटी मिलने पर वह न्यूनतम कीमत बन जाएगी लेकिन यह इतना आसान नहीं है। क्योंकि न्यूनतम कीमत तय करने के साथ खरीदे जाने वाली फसल की गुणवत्ता का मानक भी तय करना होगा।

एमएसपी की लीगल गारंटी से खाद्यान्नों की महंगाई भी बढ़ सकती है, जिससे शहरी मध्यवर्ग नाराज हो सकता है। सरकार का दावा है कि एमएसपी खरीद व्यवस्था आज भी जारी है। अभी यूं तो 23 फसलों के एमएसपी की घोषणा प्रति वर्ष की जाती है, लेकिन उनमें से खरीदारी कुछ फसलों की ही होती है। 2023 को अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष मनाने की तैयारियां चल रही हैं। मोटे अनाज का महत्व समझा जाने लगा है। ऐसे में मोटे अनाज का लाभकारी मूल्य मिले सरकारों को यह भी सुनिश्चित कराना चाहिए।

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