मुद्दे पर राजनीति

तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा पर कानूनों का समर्थन कर रहे लोग इसे देश के लिए एक महत्वपूर्ण झटका बता रहे हैं। जबकि विरोधी दल किसान लामबंदी से जुड़ने में राजनीतिक लाभ देख रहे हैं। चूंकि उन्हें लगता है कृषि सुधारों पर प्रधानमंत्री के यू-टर्न के बावजूद किसान माफ करने के मूड में नहीं है। किसान संगठनों का रुख जरा भी नरम नहीं है, वे आंदोलन का एक साल पूरा होने पर 29 नवंबर को किसान संसद तक पहले से निर्धारित मार्च पर आगे बढ़ेंगे। सोमवार को लखनऊ में किसान पंचायत, 26 नवंबर को सभी सीमाओं पर सभा होगी।

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उत्तर प्रदेश और पंजाब में आंदोलन की अगुवाई करने वाले छह संघों से जुड़े किसान कह रहे हैं कि वे उस सरकार को माफ नहीं करेंगे, जिसने विरोध करने वाले किसानों को आतंकवादी और देशद्रोही करार दिया। विपक्ष भाजपा के लोकलुभावन विकास और हिंदुत्व के मेल का तोड़ निकालने को रास्ता तलाश रहा है। कहा जा रहा है कि किसान हितैषी होना विभाजनकारी होना नहीं है। विपक्ष इस बात को भी हवा दे रहा है कि सत्तारुढ़ दल के प्रमुख लोग दावा कर रहे हैं कि जरुरत पड़ी तो किसान विधेयक फिर लाया जाएगा।

उधर कृषि कानूनों की वापसी पर मुक्त बाजार की प्रतिक्रिया देखना दिलचस्प है। उद्योग जगत के प्रतिनिधि कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने विरोध करने वाले किसानों के साथ सहानुभूति जताते हुए कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा की है, लेकिन सरकार को उसी रफ्तार से कृषि क्षेत्र में सशक्त सुधार पर विचार करना होगा।

चूंकि किसानों की आय में सुधार के लिए कृषि क्षेत्र में भी सुधार की जरूरत है। कृषि कानूनों के पूर्ण समर्थन में आने वाला उद्योग जगत के अनुसार ये कृषि कानून किसानों के लाभ के लिए बनाए गए थे, न कि उद्योग के लिए अधिक लाभ कमाने के वास्ते। वैसे भी न्यायालय के निर्देशों के अनुसार ये कानून विलंबित थे। गौरतलब है कि नए कृषि कानून बन जाने के बाद दिग्गज कंपनियां थोक में कृषि जिंसों की खरीद करने पर विचार कर रही थीं, क्योंकि नए कानूनों ने खरीद में आसानी सुनिश्चित की थी। लेकिन आंदोलन की वजह से कंपनियां इस संबंध में आगे नहीं बढ़ सकी थीं।

अब इन कानूनों को वापस लिए जाने से कंपनियों को उत्पादों की आपूर्ति के लिए पुराने तरीकों पर वापस जाना होगा, जिसमें सरकारी मंडियां, थोक बाजार भी शामिल है। कानूनों की वापसी कुछ कंपनियों के लिए झटका तो है ही, जिन्होंने पहले से ही जिंसों की बंपर खरीद व भंडारण के लिए संसाधन जुटा लिए थे।

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