श्रम क्षेत्र में भागीदारी

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महिलाओं के साथ भेदभाव एक बड़ी समस्या है। देश में महिलाएं इसलिए श्रम क्षेत्र का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं क्योंकि उन्हें पैसा कम मिलता है और लैंगिक भेदभाव भी झेलना पड़ता है। मानवाधिकार संगठन ऑक्सफैम ने अपनी ताजा रिपोर्ट में यह बात कही है। हालांकि महिलाओं के साथ भेदभाव को उजागर करती ऐसी रिपोर्ट पहले भी आती रही हैं। यह एक जाना-माना तथ्य है कि भारत में अधिकतर महिलाओं को कार्यस्थल पर शोषण अथवा भेदभाव से गुजरना पड़ता है।

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इसके अलावा एक समस्या उनकी घरेलू और सामाजिक जिम्मेदारियां भी हैं जो उन्हें काम करने से हतोत्साहित करती हैं। इस रिपोर्ट में उपयोग किए गए डेटा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, और अखिल भारतीय ऋण और निवेश सर्वेक्षण-भारत सरकार द्वारा संकलित आधिकारिक आंकड़ों से लिए गए हैं। 15 से 64 आयु वर्ग की महिलाओं के अनुपात को मापती महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर का अनुमान 25.1 प्रतिशत है।

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यह ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे अन्य ब्रिक्स देशों में देखी गई दर से काफी कम है। इसके अलावा, भारत के लिए वर्तमान दर पहले की तुलना में बहुत कम है। 2004-05 में इस देश में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 42.7 फीसदी थी। यह गिरावट आश्चर्यजनक है क्योंकि इस अवधि में आर्थिक विकास के बावजूद गिरावट का रुख बना हुआ है। यह श्रम बाजार से आर्थिक रूप से सक्रिय महिलाओं की महत्वपूर्ण वापसी को दर्शाता है।

ऑक्सफैम की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह मुख्य रूप से श्रम बाजार में अंतर्निहित लैंगिक भेदभाव के कारण है। श्रम बाजारों में लैंगिक भेदभाव दुनिया भर में मौजूद है। यहां तक कि विकसित बाजारों और संपन्न देशों में भी। भारत में महिलाओं के साथ किया जाने वाला विभेदक उपचार बचपन से ही शुरू हो जाता है और भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल तक में प्रकट होता है। सामाजिक और सांस्कृतिक रूढ़िवाद के चलते लड़कियों को गृहिणी बनने के लिए मजबूर किया जाता है।

पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महिलाओं को काम करने के लिए बढ़ावा देने की जरूरत का जिक्र किया था। उन्होंने राज्यों से आग्रह किया था कि काम के घंटों को लचीला रखा जाए ताकि महिलाओं को श्रम शक्ति का हिस्सा बनाया जा सके। उन्होंने कहा था कि अपनी नारी शक्ति का इस्तेमाल किया जाए तो ‘भारत अपने आर्थिक लक्ष्यों तक’ जल्दी पहुंच सकता है। वास्तव में भारत यदि महिलाओं को श्रम क्षेत्र में शामिल करना चाहता है तो सरकार को बेहतर वेतन, प्रशिक्षण और नौकरियों में आरक्षण जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। नियोक्ताओं को भी महिलाओं को काम पर रखने के लिए प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है।

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