गांधी के विचारों की हत्या: इकोसाइड

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गांधी की हत्या और इकोसाइड (पारिस्थितिकी नाशक) पर बात करते समय यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि गांधी के चिंतन या लेखन में ‘पर्यावरण’शब्द का प्रयोग नहीं मिलता तब इकोसाइड शब्द तो पिछले दशक ही प्रयोग में आया है । इसलिए इस शब्द का अर्थ समझने के लिए इसकी परिभाषा समझना आवश्यक है। जो की दुनिया के कानून की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों ने कुछ इस तरह से दी है।

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“इकोसाइड” का अर्थ है वह गैरकानूनी या कार्य जो इस ज्ञान के साथ किए गए हैं कि इन कृत्यों के कारण पर्यावरण को गंभीर और व्यापक या दीर्घकालिक क्षति होने की पर्याप्त संभावना है। इसीलिए गांधी की हत्या और इकोसाइड में एक समानता है वह यह है कि जिस तरह प्रकृति नष्ट होने पर धरती पर जीवन असंभव है उसी तरह अगर गाँधी के साथ उनके विचारो को भी मार दिया जाय तो धरती से मानवीय मूल्यों का ह्रास होने लगेगा।यानी जिस तरह प्रकृति का अस्तित्व हमारे जीवन के लिए जरूरी है, उसी तरह महात्मा के विचारो का अनुपालन मानवता के लिए जरूरी है व था।

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लेकिन आज गाँधी जी के सिंद्धान्तो और सविधान से आम आदमी का इतना लगाव है कि दोनों को अपने दिल व् दिमाग में नहीं बल्कि जेब में रखना पसंद करता है। ताकि जरूरतों के हिसाब से इन्हे खर्च कर सके। गाँधी इस देश की कभी न ख़त्म होने वाली पूँजी है बशर्ते उनको स्वार्थ व लालच से परे रखकर खर्च किया जाय।लेकिन इस पूँजी को देश के समाजसेवियों, नेताओं, समाज सुधारको आदि ने अपने अपने तरीके से खर्च किया। किसी ने गाँधी के विचार व् ऊसूल बेचे, किसी ने अहिंसा और किसी ने उन पर की गयी हिंसा (हत्या ) को बेचा। गाँधी अपने न्याय, समरसता, अहिंसा आदि के लिए पूरी दुनिया में पूजे जाते है।

लेकिन भारत ही एक ऐसा देश है जिसने स्वच्छता के नाम पर गाँधी के चश्मे को हर शौचालय बाहर लगा दिया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि गाँधी जी स्वच्छता को लेकर बहुत गंभीर थे लेकिन इसका मतलब यह नहीं की गाँधी और शौचालय में कोई फर्क न किया जाय। इतना ही नहीं कुछ लोगो ने तो अहिंसा के महात्मा पर एक स्वच्छता अभियान चलाकर उनकी अहिंसा को भी साफ़ कर दिया। देश के प्रतिनिधियो ने समय समय पर जनता की अदालत में अपनी वकालत चमकाने के लिए उनको अपनी दलीलों में कभी अहिंसा, तो कभी स्वच्छता आदि के सहारे भिन्न्न भिन्न नाम देकर उनको उस तरह का नायक करार दे दिया।

वैसे तो गाँधी जी का जन्म, मृत्यु (हत्या ), व देश को स्वंतंत्रता शुक्रवार के दिन मिली थी। लेकिन इस बार इस बर्ष ३० जनवरी को इतवार है | इसलिए मैंने भी सोचा कि इसलिए क्यों न नीति निर्माताओं, नेताओं व नौकरी पेशा लोगो के लिए छुट्टी के दिन कुछ टाइम पास करने के लिए एक लेख गाँधी के ऊपर लिख दिया जाय।

क्योंकि गाँधी जी भी कभी कभी मजाक कर लेते थे| उदाहरण के लिए जब अंग्रेजी इतिहासकार एडवर्ड थॉमसन ने एक बार गांधी से टिप्पणी की थी कि भारत में वन्यजीव तेजी से घट रहे हैं, जिस पर गांधी ने व्यंग्य के साथ जवाब दिया, “जंगलों में वन्यजीव कम हो रहे हैं, लेकिन कस्बों में बढ़ रहे हैं।” यद्यपि महात्मा गांधी कोई पर्यावरणविद नहीं थे तथापि प्राकृतिक नियमों के अनुरूप वे एक ऐसी जीवन पद्धति के पक्षधर जरूर थे जो नैसर्गिक रूप से पर्यावरण संरक्षण के हितैषी हो।

गांधीजी चाहते थे कि आधुनिक तकनीक मानव केंद्रित प्रकृति संगत बने प्रकृति के साथ उसका विरोधाभास ना हो और वह मनुष्य की सर्जनशीलता के अनुरूप हों । इसलिए यह ध्यान देने योग्य है कि वह “दृष्टि और व्यवहार में दुनिया के प्रथम पर्यावरणविद् थे।” इसके अलावा उन्होंने सत्याग्रह और लोकतंत्र के सर्वशीर्षथ उदाहरण अपने विचारो से दुनिया के सामने पेश किये ही है । यही कारण था कि जिनको सदभाव से खतरा था उन्होंने ही गाँधी की हत्या की।

गाँधी वो पोलिटिकल टूल है जिसके बिना रहना बहुत ही मुश्किल है। भले ही आप नफरत करते हो लेकिन जनता जनार्दन के सामने जनता का प्रतिनिधित्व करने वालो को यह दिखाना ही पड़ेगा की वह गाँधी को प्रेम करते है क्योंकि वह गाँधी की जीवन शैली की अच्छी तरह से व्याख्या कर सकते है। लेकिन किसी के बनाये नियमो पर चलना और उनके बारे में जान लेना दोनों दूर की कोड़ी है।

गाँधी ने वर्तमान सभ्यता को अंतहीन इच्छाओं और शैतानिक सोच से प्रेरित बताया। उनके अनुसार, असली सभ्यता अपने कर्तव्यों का पालन करना और नैतिक और संयमित आचरण करना है। उनका दृष्टिकोण था कि लालच और जुनून पर अंकुश होना चाहिए। टिकाऊ विकास का केंद्र बिंदु समाज की मौलिक जरूरतों को पूरा करना होना चाहिए।

इस अर्थ में उनकी पुस्तक “द हिंद स्वराज”टिकाऊ विकास का घोषणापत्र है। जिसमें कहा गया है कि आधुनिक शहरी औद्योगिक सभ्यता में ही उसके विनाश के बीज निहित है। ध्यान रहे यहाँ पर किसी भी तरह से किसान आंदोलन व स्मार्ट सिटी जैसी योजनाओं पर कोई कटाछ नहीं किया जा रहा है। क्योंकि गाँधी ने इस तरह के कानूनों व योजनाओं का कभी समर्थन नहीं किया।

लेकिन वोकल फॉर लोकल या वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट जैसे नारो में आजीविका, महिला सशक्तिकरण, कुपोषण, पलायन एवं पर्यावरण संरक्षण आदि गाँधी के विचारो से समर्थित है। क्योंकि गाँधी ने निर्णय ले रखा था कि दूरदराज के स्थानों से लाए जाने वाले खाद्य पदार्थ वे नहीं खाएंगे। उनका मानना था कि जब वस्तुओं को लंबी दूरी से ले जाया जाता है, तो परिवहन, संरक्षण और पैकिंग में बहुत ज्यादा ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। दूर स्थानों से भोजन के लाने और उन पर निर्भरता से काफी उर्जा का प्रयोग होता है जिसकी वजह से काफी अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है इसलिए उन्होंने कुछ किलोमीटर के भीतर उपलब्ध पदार्थों के प्रयोग का निर्णय लिया था ।

जलवायु के अर्थशास्त्र पर यूके में निकोलस स्टर्न कमेटी रिपोर्ट ग्रीन हाउस गैस के कम उपयोग के साथ- साथ जीवन शैली में बदलाव करके एक कार्बन अर्थव्यवस्था से एक गैर कार्बन अर्थव्यवस्था में स्थानांतरित होने पर जोर देती है। इस बात को गांधी जी ने कई अवसरों पर लिखा है कि मनुष्य जब अपनी भौतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादा दूर के संसाधनों को प्रयोग करेगा तो प्रकृति की व्यवस्था नष्ट होगी। उनका स्वदेशी चिंतन और 1911 में “प्रकृति की अर्थव्यवस्था” वाक्यांश के निर्माण के जरिए ही प्रकृति के प्रति उनकी गहरी समझ और संवेदनशीलता को समझा जा सकता है।

हम सभी 1930 के गांधी जी के ऐतिहासिक दांडी मार्च से परिचित हैं। इसके जरिए उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों पर आम लोगों के अधिकारों पर जोर दिया था। नमक एक महत्वपूर्ण और बुनियादी प्राकृतिक जरूरत है। ब्रिटिश साम्राज्य संसाधनों पर अपना एकाधिकार रखता था और उन्हें उनके वैध मालिकों की पहुंच से वंचित रखता था। बुनियादी संसाधनों से आम लोगों को दूर रखना उनकी अस्थिर विकास की रणनीति का हिस्सा था।

नमक कानून तोड़कर और आम लोगों को नमक बनाने का अधिकार देकर उन्होंने उन्हें सशक्त बनाने का काम किया जो कि टिकाऊ विकास का केंद्रीय मुद्दा था । दांडी मार्च खत्म होने के बाद, उन्होंने अपने बड़े लक्ष्यों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस मार्च का उद्देश्य भारत की आजादी से भी आगे जाकर दुनिया को भौतिकवाद के राक्षसी लालच के चंगुल से मुक्त करना है। यह एक शक्तिशाली बयान था जिसमें उन्होंने लालच पर आधारित आधुनिक सभ्यता की आलोचना के साथ साथ टिकाऊ विकास पर जोर दिया था।

गांधी को दृढ़ विश्वास था कि पारिस्थितिकीय से सम्बंधित सभी कार्य पूरी तरह हिंसात्मक नहीं होने चाहिए। उन्होंने कहा था “हम तब तक प्रकृति के विरुद्ध हिंसा को रोकने वाला पारिस्थितिकी आंदोलन नहीं बना सकते जब तक अहिंसा का सिद्धांत मानव संस्कृति की नीति का केंद्र नहीं बनता।”

गांधी का सभी साथी प्राणियों के लिए नैतिक और धार्मिक दृष्टिकोण उन सभी जीवों की पहचान के आधार पर स्थापित किया गया है जहां इसका गहन आधुनिक पारिस्थितिकी आंदोलन की चिंताओं के साथ विलय हो गया। उनके लिए अहिंसा परिकल्पित अथवा सभी जीवों की अंतर्निर्भरता की जागरुकता को समाहित करने वाली है। अहिंसा केवल अनुशासित माहौल में उभर सकती है जिसमें एक व्यक्ति आध्यात्मिक सुख की तलाश में शारीरिक सुखों का त्याग करता है।

जाहिर है जो प्राणिमात्र की एकता में विश्वास करेगा वह चर-अचर, पशु-पक्षी, नदी-पर्वत-वन सबके सहअस्तित्व में विश्वास करेगा और उस सब के संरक्षण में तत्पर रहेगा। आज पर्यावरण बचाने के नाम पर बाघ, शेर, हाथी आदि जानवरों, नदियों, पक्षियों, वनों आदि को बचाने का जो विश्वव्यापी स्वर उठ रहा है, यही तो सभी प्राणियों की एकता में विश्वास करने वाली बात में अंतर्निहित है।

दरअसल, जो लोग गांधी की अहिंसा का दायरा सिर्फ मनुष्य द्वारा मनुष्य के खिलाफ हिंसा का निषेध या शाकाहार तक समझते हैं, वे उनकी अहिंसा का अधूरा पाठ समझते हैं। वस्तुत: जब तक नाना प्राकृतिक संसाधनों-वनस्पतियों, नदियों, पर्वतों के साथ-साथ पशु-पक्षियों को आवास सुलभ कराने वाले स्थानों की कीमत पर चलने वाली औद्योगिक पद्धति को बदल कर उसे मानव श्रम, प्रकृति की संगति पर आधारित नहीं करते तब तक अहिंसा अपने संपूर्ण संदर्भ में अर्थपूर्ण नहीं हो सकती। एक कारण यह भी है कि देश का पर्यावरणप्रेमी व आदिवासी नदी गठजोड़ जैसी बड़ी परियोजनाओं का विरोध करता है।

वस्तुत: गांधीजी की दृष्टि में श्रम आधारित उद्योग-शिल्प ही वह चीज थी जिसकी बदौलत मनुष्य भोजन, वस्त्र, आवास जैसी आवश्यकताओं के जिहाज से स्वावलंबी रहता आया था और अन्य प्राणी भी सुरक्षित रहते आए थे- न कभी पर्यावरण का संकट आया, न पीने के पानी का संकट आया, न ग्लोबल वार्मिंग का खतरा पैदा हुआ, न किसी पशु-पक्षी, पेड़ की प्रजाति के समाप्त होने का खतरा। इसके विपरीत यूरोप की औद्योगिक क्रांति की कोख से पैदा होकर जो उत्पादन-शिल्प सामने आया, वह मजदूरों का शोषण करने वाला तो था ही, प्राकृतिक संपदाओं का भी निर्मम दोहन करने वाला था।

कार्ल मार्क्स ने इस उत्पादन-शिल्प के जुए तले मजदूरों का शोषण तो देख लिया, लेकिन मनुष्येतर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को, मशीनीकरण की आंधी से उजड़ते यूरोप को नहीं देख सके। इसे देखा गांधी ने जिसे ‘हिंद स्वराज’ में इन शब्दों में रखा ‘मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी है और वह महा पाप है। मशीन की यह हवा अगर ज्यादा चली, तो हिंदुस्तान की बुरी दशा होगी।’यहाँ पर देश का आम आदमी व किसान गाँधी के विचारो को सच करने के लिए स्टार्ट अप व प्राकृतिक खेती की वकालत करना चाहेगा ।

विकास के यूरोपीय मॉडल से सावधान करते हुए पांच अक्तूबर 1945 को जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में गांधी ने कहा था ‘मुझे कोई डर नहीं है कि दुनिया उलटी ओर ही जा रही दिखती है। यों तो पतंगा जब अपने नाश की ओर जाता है तब सबसे ज्यादा चक्कर खाता है और चक्कर खाते-खाते जल जाता है। हो सकता है कि हिंदुस्तान इस पतंगे के चक्कर में से न बच सके। मेरा फर्ज है कि आखिरी दम तक उसमें से उसे और उसकी मार्फत दुनिया को बचाने की कोशिश करूं।’इक्कीसवीं सदी को सुख और शांति का गौरवशाली पुण्य काल बनाने के लिए इकोसाइड को रोकना ही गांधीवादी तरीका ही, एकमात्र तरीका है।

गांधी की सर्वोदय की दृष्टि के अनुसार उनका यह विचार कि “प्रकृति में हर किसी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन किसी के लालच को संतुष्ट करने के लिए नहीं” जिसको संक्षेप में “लालच के लिए लूट” कहना उचित होगा, आधुनिक पर्यावरणवाद के लिए यह पंक्ति नैतिकता बन गई। सौ साल पहले 1909 में लिखी गई, उनकी मौलिक कृति, हिंद स्वराज ने पर्यावरण के विनाश और धरती के लिए खतरे के रूप में आज दुनिया के सामने आने वाले खतरों की चेतावनी दी थी ।

शहरीकरण के संबंध में, गांधी ने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए: “यह गांवों से दोहरी निकासी की प्रक्रिया है। भारत में शहरीकरण उसके गांवों और ग्रामीणों के लिए एक धीमी लेकिन निश्चित मौत है। इसीलिए वह कहते थे कि “मुझे प्रकृति के अलावा किसी प्रेरणा की आवश्यकता नहीं है। उसने मुझे अभी तक कभी असफल नहीं किया है। वह मुझे विस्मित करती है, मुझे भ्रमित करती है, मुझे परमानंद में भेजती है।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि गांधी का पर्यावरणशास्त्र भारत और विश्व के लिए उनके इस समग्र दृष्टिकोण के अनुरूप है कि मनुष्य का अस्तित्व बने रहने के लिए जो अत्यंत आवश्यक है वही प्रकृति से मांगा जाए। पर्यावरण के संबंध में उनके विचार राज्य व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और विकास से संबंधित उनके सभी विचारों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।

उनके वैराग्य और सादा जीवन, ग्रामीण स्वायत्तता और स्वावलंबन पर आधारित ग्राम केंद्रित सभ्यता, हस्तशिल्प और कला केंद्रित शिक्षा, मानव श्रम पर जोर और शोषक संबंधों को हटाने में पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण का तत्व शामिल है। इसीलिए गांधी लाइफ स्टाइल के बारे में कहते थे कि जो व्यक्ति अपनी दैनिक आवश्यकताओं को कई गुना बढ़ाता है वह सादा जीवन, उच्च विचार के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता।

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