आध्यात्मिक शांति चाहिए तो उत्तराखंड का द्वाराहाट है आपके लिए खास…

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हल्द्वानी, अमृत विचार। कुमाऊं के अल्मोड़ा जिले के अंतर्गत आने वाले द्वाराहाट में इन दिनों खासी चहल-पहल रहती है। यहां की नैसर्गिक सुंदरता आपको अभिभूत कर देगी। समुद्र तल से 1500 मीटर (5000 फ़ुट) में बसे द्वाराहाट में वैसे तो वर्ष भर ही मौसम हसीन रहता है लेकिन सर्दियों में कड़ाके की ठंड़ भी पड़ती है। वहीं यहां मौजूद योगदा आश्रम अपने आप में आकर्षण का केंद्र है, यह आश्रम दरसअल उन लोगों के लिए है जन्हें आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति करनी होती है। ध्यान योग साधना से जुड़े पर्यटक वर्षभर यहां आकर रूकते हैं और क्रिया योग की बारिकियों को सीखते हैं।

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बात करें यहां मौजूद योगदा आश्रम की तो यह , द्वाराहाट शहर से लगभग 1.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है चारों ओर से चीड़ के जंगल से घिरा आश्रम आपको मंत्रमुग्ध सा कर लेता है। शहर से आश्रम की ओर आते समय रास्ते में, दाहिनी ओर राज्य सरकार का एक विश्राम गृह है, जहाँ श्री श्री दया माता जी सन 1963-64 की अपनी बाबाजी की गुफा की यात्रा के दौरान ठहरी थीं, चूँकि उस समय तक यहाँ पर योगदा आश्रम नहीं बन पाया था। आपको बता दें कि योगदा आश्रम पश्चिम बंगाल से आए स्वामी परमहंस योगानंद की तपोभूमि है। यहीं से उन्होंने अपने गुरू स्वामी युक्तेश्वर गिरि से क्रिया योग की दीक्षा ली थी।

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महावतार बाबाजी ने ही लुप्त हो चुकी इस वैज्ञानिक क्रियायोग की तकनीक को इस युग में पुनर्जीवित किया है। अपने शिष्य लाहिड़ी महाशय को क्रियायोग की दीक्षा देते हुए बाबाजी ने कहा था, “मैं तुम्हारे माध्यम से उन्नीसवीं शताब्दी में जो क्रियायोग इस संसार को दे रहा हूँ, यह इसी क्रियायोग का पुनःप्रवर्तन है जिसे आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया था, तत्पश्चात जिसमें पतंजलि, जीसस क्राइस्ट, सेंट जॉन, सेंट पॉल और कुछ अन्य शिष्यों को दीक्षित किया गया था।”

1920 में परमहंस योगानन्दजी के अमेरिका गमन से कुछ पूर्व महावतार बाबाजी योगानन्दजी के कोलकाता स्थित निवास में उनके समक्ष प्रकट हुए थे। उस समय युवा संन्यासी (योगानन्दजी) अपने उस महान उद्देश्य जो उन्हें अमेरिका में पूरा करना था उसकी सफलता के लिए दैवीय आश्वासन हेतु गहन प्रार्थना कर रहे थे। बाबाजी ने उनसे कहा था, “अपने गुरु की आज्ञा का पालन करो और अमेरिका जाओ, डरो मत; तुम सुरक्षित रहोगे। पश्चिम में क्रियायोग का विस्तार करने के लिए मैंने तुम्हारा चुनाव किया है।”

बाबाजी की गुफ़ा का क्षेत्र वह क्षेत्र है जहाँ बाबाजी ने सन 1861 में लाहिड़ी महाशय को दीक्षा प्रदान की थी तथा इस द्वापर युग में क्रिया योग की जन्म स्थली भी है। विश्व भर के सभी क्रिया योगी अपनी गुरु परम्परा को इस घटना से जोड़ सकते हैं। यह गुफ़ा पांडुखोली पर्वत पर कूक्कूछिना गाँव (द्वाराहाट से 25 किलोमीटर की दूरी पर) से थोड़ा सा आगे स्थित है। गुफ़ा तक जाने के लिए पर्वतीय मार्ग का पुनर्निर्माण कराया गया है। एक सामान्य व्यक्ति को यहाँ से गुफ़ा तक की चढ़ाई में लगभग एक घंटे का समय लग जाता है। बरसात के दिनों में रास्ते के साथ साथ कुछ धाराएँ भी बहती हैं, जो की योगी कथामृत में वर्णित ‘गगास’ नदी में जा मिलती हैं। आश्रम से गुफ़ा तक जाने और आने में लगभग छः से आठ घंटों का समय लग जाता है।

क्या है क्रिया योग
योग मार्ग में सफलता पाने के लिए सबसे तीव्र और सबसे अधिक प्रभावशाली विधि जो सीधे उर्जा और चेतना का प्रयोग करती है। यह सीधा मार्ग है जो आत्मज्ञान के एक विशेष तरीके पर बल देता है जिसे परमहंस योगानन्दजी ने सिखाया है। विशेषतया, क्रिया राजयोग की एक ऐसी विकसित विधि है जो शरीर में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा की धारा को सशक्त और पुनर्जीवित करती है जिससे हृदय और फेफड़ों की सामान्य गतिविधि स्वाभाविक रूप से धीमी हो जाती है। इसके फलस्वरूप चेतना, बोध के उच्चतर स्तर पर उठने लगती है जो क्रमशः धीरे-धीरे अंतः करण में आंतरिक जागृति लाती है जो मन एवं इंद्रियों से प्राप्त होने वाले सुख के भाव से कहीं अधिक आनंदमय व गहरा आत्मसंतोष प्रदान करने वाली होती है।

सभी धर्म ग्रंथ यह उपदेश देते हैं कि मनुष्य एक नाशवान शरीर नहीं है, बल्कि एक जीवंत अमर आत्मा है। प्राचीन काल से मानवता को प्रदान किया गया क्रियायोग उस राजमार्ग का उद्घाटन करता है जो शास्त्रों में वर्णित सत्य को सिद्ध करता है। क्रियायोग के विज्ञान का निष्ठा के साथ अभ्यास करने की अद्भुत क्षमता के विषय में परमहंस योगानन्दजी ने घोषणा की थी; “यह गणित की तरह काम करता है; यह कभी असफल नहीं हो सकता।”

कई विशिष्ट लोग आ चुके हैं आश्रम में
योगदा आश्रम में अब तक फिल्मी अदाकारा जूही चावला, अभिनेता रजनी कांत, पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती सहित कई बडे़ चिकित्सक, व्यवसायी आकर आध्यात्म को आत्मसात कर चुके हैं।

 

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