मानवाधिकार के सवाल

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मानवाधिकारों के नाम पर कुछ लोग देश की छवि खराब करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में मानवाधिकारों को राजनीतिक लाभ-हानि की दृष्टि से देखना, इन अधिकारों के साथ-साथ लोकतंत्र को भी हानि पहुंचाता है। प्रधानमंत्री का कहना सही है, क्योंकि मानवाधिकार एक ऐसा विषय है, जिस पर एक पक्षीय विचार नहीं किया जा सकता। किन्तु राजनीतिक या स्वार्थपरक अथवा अन्य दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मानवाधिकारों का सहारा लेना बिलकुल गलत है।

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समसामयिक दृष्टिकोण से मानवाधिकारों का सम्मान गंभीर चिंतन का विषय बना हुआ है। देश में मानवाधिकारों के प्रति सजगता है, किन्तु इस सजगता में और अधिक धार लाने की आवश्यकता है। आज पूरे विश्व में ताकत और पैसे के बल पर होने वाली हिंसा इस बात का प्रत्यक्ष सबूत है कि मानवता खतरे में है। मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष अरुण कुमार मिश्रा ने इसी मौके पर कहा कि मानव ही मानवता के विनाश के लिए आमादा है। 20वीं सदी में विश्व में राजनीतिक हिंसा के कारण लगभग 12 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई।

यह दुर्भाग्य है कि देश विदेश में राजनीतिक हिंसा आज भी समाप्त नहीं हुई है। समाजसेवी संस्थाओं और मानवाधिकार संरक्षकों को राजनीतिक हिंसा एवं आतंकवाद की निंदा करनी चाहिए। इस मामले में उदासीनता कट्टरवाद को जन्म देगी। वास्तव में आज दुनिया में संपन्न और शक्तिशाली लोगों के बीच यदि लोग सुरक्षित ढंग से रह पा रहे हैं तो उसका एकमात्र कारण सबको मिलने वाला तथाकथित मानवाधिकार है। यूं तो मानवाधिकार सबके लिए समान है, किन्तु इसका वास्तविक लाभ उसे ही मिल पता है, जिसके पास पर्याप्त जानकारी, सामर्थ्य अथवा संसाधन उपलब्ध हैं।

देश में मानवाधिकार आयोग की स्थापना को 28 वर्ष पूरे हो गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आम नागरिक आज भी जिन समस्यायों का सामना कर रहा है, क्या मानवाधिकार आयोग उनका समाधान निकाल कर उनके मानव अधिकारों की रक्षा कर पाने में सफल हो पाया है? ऐसे में यह जानना ज़रूरी है कि किन कारणों से मानवाधिकारों की रक्षा करने में आयोग खुद को लाचार पा रहा है।

मानवाधिकार आयोग मानवाधिकारों के उल्लंघन का संज्ञान लेता है, जांच करता है और सार्वजनिक प्राधिकारों द्वारा पीड़ितों को दिए जाने के लिए मुआवजे की सिफारिश करता है। केंद्र तथा राज्य सरकारें आयोग की सिफारिशें मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। लिहाज़ा मानवाधिकारों के मज़बूती से प्रभावी नहीं रहने का सबसे बड़ा कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव ही है।

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