हम अपनी लाइफ में ये कैसे तय करते हैं कि किस पर भरोसा करें और किस पर नहीं?

ऐसा लगता है कि हम गलत जानकारियों के दौर में जी रहे हैं। कई प्रसारणकर्ता और सोशल मीडिया सेलिब्रिटी विज्ञान एवं डेटा के बारे में सार्वजनिक तौर पर अपने दर्शकों को गलत तथ्य या गलत व्याख्या बताते हैं। इनमें से कई दर्शक, जो सुनना चाहते हैं यदि वह उन्हें बताया जा रहा हो तो उन्हें इस बात की परवाह तक नहीं होती कि उन्हें दी जा रही जानकारी सही है या गलत। गलत सूचनाओं का प्रसार लोगों के अपने ज्ञान और फैसले पर अत्यधिक भरोसे के कारण होता है। कई मामलों में यह स्वहित से जुड़ा होता है।

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हममें से कई लोगों की विरोधाभासी मान्यताएं होती हैं। हो सकता है कि हम ऐसा विश्वास करते हों कि मौत की सजा से अपराध पर लगाम लगती है या न्यूनतम वेतन बढ़ाने से बेरोजगारी कम होती हो या कारोबारी कर बढ़ाने से नवोम्नेष में कमी आती हो। हो सकता है कि हम सोचते हों कि महिलाओं का गणित पुरूषों के मुकाबले कम अच्छा होता है या फिर कोई यह भी मान सकता है कि धरती चपटी है। इनमें से कई मान्यताओं पर हम बहुत ही मजबूती से भरोसा करते हैं लेकिन जब भी हम इन मान्यताओं को तार्किक रूप से सही साबित करने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि हमारे पास इसके पक्ष में साक्ष्य तो हैं ही नहीं।

इस तरह के लोगों के बारे में कहा जाता है कि उन पर ‘डनिंग-क्रुगर’ प्रभाव है। इसका मुख्य रूप से मतलब यह है कि किसी व्यक्ति को किसी बात पर बहुत अधिक भरोसा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह सही ही है। अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे लेकिन इसे लेकर गलत लोगों में यह आत्मविश्वास उनकी अनभिज्ञता के कारण नहीं होता बल्कि इसलिए होता है क्योंकि वे हर चीज के बारे में स्वाभाविक रूप से आश्वस्त होते हैं। कुछ अनुसंधानकर्ता इसे उनका अहंकार बताते हैं।

विकल्प मौजूद होने की स्थिति में हमारी मान्यताएं किस तरह तय होती हैं? वैज्ञानिक साक्ष्य इसमें मददगार हो सकते हैं लेकिन फिर भी हम उसी बात पर विश्वास करते हैं जिस पर हम विश्वास करना चाहते हैं। कई बार जब हमें यह पता चलता है कि किसी मान्यता विशेष का समर्थन ‘हमारी’ ओर का व्यक्ति कर रहा है तो उस मान्यता को समर्थन देने के लिए यही पर्याप्त होता है। ऐसे कई ताजा विवादों में यह बात सामने आई है।

फिर चाहे कोविड टीके लगवाना हो या मास्क जरूरी होने की बात हो या फिर परमाणु ऊर्जा को पर्यावरण के लिए अच्छा मानने की बात। हम अपने आदर्शों और मार्गदर्शकों की ओर देखते हैं और उनकी बात पर अमल करते हैं। हम उन लोगों के भी पीछे चलने लगते हैं जो अति आत्मविश्वास से भरे हैं जबकि विश्वास सही आकलन नहीं करता।

इसी तरह जानबूझकर गलत सूचनाएं प्रसारित करने वाले जानेमाने प्रसारणकर्ता, सोशल मीडिया सेलिब्रिटी और विषय विशेषज्ञ भी इस मामले में किसी से अलग नहीं हैं। महामारी के दौरान हमने स्वीकार्य वैज्ञानिक सोच को माना, लेकिन संभवत: ऐसी भी परिस्थितियां रहीं होंगी जहां हमने गलत निर्णयों, विचारों या निजी लाभ पर आधारित धारणाएं मानी हों।

(डैनियल रीड, प्रोफेसर ऑफ बिहेवियरल साइंस, वारविक बिजनेस स्कूल, यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक)

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