हल्द्वानी: चीड़ के पेड़ की छाल पर 62 साल के “चाचू” की कमाल की कलाकारी

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भूपेश कन्नौजिया, हल्द्वानी, अमृत विचार। 62 साल उम्र हो गयी है, जिंदगी एकदम बढ़िया कट रही है अब इस उम्र में क्या शादी करें, कभी इस बारे में सोचा ही नहीं बस एक सपना है वो पूरा हो जाए तो जिंदगी सफल हो जाए। यह कहना है हुनरमंद चाचू का, जिनका असल नाम जीवन चंद्र जोशी है वो बात अलग है कि पूरा मोहल्ला,नाते-रिश्तेदार उन्हें चाचू के नाम से जानता है। कहने को वह शारीरिक रुप से दिव्यांग हैं मगर उनकी इच्छाशक्ति, मेहनत और जिंदादिली को देखते हुए उन्हें दिव्यांग कहना न्याय संगत नहीं होगा।

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पहले अल्मोड़ा और अब मूल रुप से हल्द्वानी के कठघरिया निवासी जीवन चंद्र जोशी चीड़ के पेड़ की छाल (बगेट) पर अपनी रचनात्मक सोच को उकेरते हैं वो भी बिना किसी आधुनिक संसाधनों के। सारा काम अपने हाथ से करते हैं, कलाकारी ऐसी की हर कोई यह देख स्तब्ध हो जाता है। बदरीनाथ,केदारनाथ धाम सहित कई कलाकृतियां बना चुके जीवन अब कुछ बच्चों को भी कला सीख रहे हैं मगर उन्हें अफसोस है कि अब गिनेचुने युवा ही इसको सीखना चाहते हैं जबकि इसे सीख युवा काफी अच्छा स्वरोजगार शुरु कर सकते हैं।

 

काष्ठकला के नायाब कलाकृतियों की खासी मांग रहती है जीवन का कहना है कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, नहीं तो वे युवाओं को मुफ्त प्रशिक्षण देते हलांकि गुजर बसर के लिए काफी कम फीस लेकर कुछ लोगों को सीखा भी रहे हैं। प्रशासन के आला अधिकारियों को अपनी कलाकृतियों से कई आर अवगत करा चुके जीवन अब थक गए हैं उनका कहना है कि आर्थिक मदद तो दूर उन्होंने प्रशासन से मदद मांगी थी कि कहीं दुकान खुलवा दें या कोई जगह उपलब्ध करवा दें ताकि वह अपने उत्पादों को डिस्पले कर सकें और युवाओं को कार्यशाला के माध्यम से इस कला से रूबरू करवा सकें।

बहरहाल जीवन अब अपनी कलाकृति के माध्यम से आजादी के 75वें अमृत महोत्सव के मस प्रवेश करने के अवसर पर देशभक्ति का संदेश लोगों को दे रहे हैं। उनके द्वारा अपने काष्ठ शिल्प के हुनर के माध्यम से 75 कलाकृतियां बनाई जा रही हैं जो कि 15 अगस्त को स्टॉल लगाकर प्रदर्शित की जाएंगी। अभी तक वे चीड़ के पेड़ की छाल (बगेट) से भारत का मानचित्र, तिरंगा झंडा,शंख,नाव,मूर्ति, भारत का नक्शा व आजादी का 75 अमृत महोत्सव बनाकर तैयार कर चुके हैं और बाकी कलाकृतियां भी 15 अगस्त तक पूरी करने का दावा कर रहे हैं। जीवन संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार से फैलोशिप होल्डर भी हैं और विगत 20 वर्षों से भी अधिक सालों से काष्ठ शिल्प के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

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