चीन के इरादे

भारत-चीन सैन्य वार्ता के असफल होने के बाद बुधवार को चीन ने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवादित बयान दिया। चीन ने उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू की पिछले दिनों की अरुणाचल यात्रा पर आपत्ति जताई। चीन, अरूणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा होने का दावा करता है और वहां भारतीय नेताओं की यात्रा पर आपत्ति व्यक्त करता है। भारत की ओर से चीन को दो टूक उत्तर दिया गया कि अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है और कोई इस पर अपना दावा नहीं कर सकता।

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चीन असंगत मुद्दे उठाने की बजाय एलएसी के बाकी मुद्दे हल करे। चीन लंबे अरसे से दावा करता रहा है कि अरुणाचल का बड़ा हिस्सा उसके भू-भाग का अंग है लेकिन भारत इसे ख़ारिज करता आया है। चीन ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर भी आपत्ति जताई थी। चीन के विरोध पर प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि जब संसद में अरुणाचल प्रदेश से चुने गए प्रतिनिधि हैं तो स्पष्ट है कि अरूणाचल प्रदेश देश का हिस्सा। चीन के खिलाफ वैश्विक शक्तियों के साथ जैसे-जैसे भारत की साझेदारी में विस्तार हो रहा है, चीन की प्रतिक्रिया में भी तल्खी आ रही है।

भारत व चीन के बीच कोर कमांडर स्तरीय 13वें दौर की वार्ता असफल रहने के बाद भारतीय सेना ने सोमवार को कहा था कि उसके द्वारा दिए गए ‘सकारात्मक सुझावों’ पर चीन की सेना सहमत नहीं हुई और ना ही उसने आगे बढ़ने की दिशा में कोई प्रस्ताव दिया। वार्ता की असफलता से जाहिर है कि जमीनी स्तर पर स्थिति सामान्य नहीं है।

यही वजह है कि भारत द्वारा दिए गए ‘रचनात्मक सुझाव’ चीन को रास नहीं आ रहे थे। विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि चीन ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा को बदलने की कोशिश की और यह दोनों देशों के बीच हुए समझौते का सीधे-सीधे उल्लंघन है। भारत ने एलएसी पर दीर्घकालिक शांति सुनिश्चित करने की जवाबदेही चीन के पाले में डालने का प्रयास किया है, लेकिन देश को चीन के दुस्साहस से बचने के लिए अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि चीन भारत के खिलाफ मोर्चा खोलने की गलती नहीं करेगा। फिर भी भारतीय सेना को आने वाली सर्दियों में जटिल भौगोलिक परिस्थितियों में चीनी चुनौती से मुकाबले के लिए डटे रहना पड़ेगा। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सेना की तैनाती अपरिहार्य हो गई है। इसके लिए व्यापक रणनीति की जरूरत होगी, ताकि इन दुर्गम इलाकों में सेना का स्थायी ढांचा तैयार हो, जिससे किसी भी विषम परिस्थिति में तत्परता से जवाब दिया जा सके।

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